एक शहर निगल गया मेरे गांव को …


आज जहाँ ये कंक्रीट का जंगल खड़ा है, यहाँ हरियाली की बहार थी,
इन चौड़ी सड़को की जगह दूर तक जाती पगडंडियों की कतार थी,
कुएं के मीठे पानी को और बरगद के पुराने पेड़ की ठंडी छांव को,
एक शहर निगल गया मेरे गांव को…

ये आज जहाँ कैफ़े कॉफ़ी डे है, एक बड़ी चौपाल हुआ करती थी,
जहाँ शाम होते ही बातों के साथ ताश की लंबी बाजियां चलती थी,
खेतों में लहलहाती फसलों को और पूरब से आती ठंडी हवाओं को,
एक शहर निगल गया मेरे गांव को…

ये जहाँ नकली झूले लगे हैं, यहाँ सावन की पींगे डला करती थीं,
जहाँ ये मिनरल वाटर बिक रहा है, यहाँ पनियारियां कुए से पानी भरती थी,
रिश्तों की मिठास को और बड़े बूढ़ों की दुआओं को,
एक शहर निगल गया मेरे गांव को…

जहाँ आज ये गाड़ियों का शोर है, एक सुकून और शांति थी,
जहाँ ये गन्दा नाला है, एक बलखाती  नदी बहती थी,
बैलगाड़ी की सवारी को और खुली सब दिशाओं को,
एक शहर निगल गया मेरे गांव को…

जहाँ आज ये फ़ास्ट फ़ूड बिक रहा है, चूल्हे पे सरसों का साग बनता था,
जहाँ भीड़ में सब अकेले हैं, वहां हर त्यौहार साथ मनता था,
मेरी माटी की सौंधी खुशबू और जमीं से जुड़ी परम्पराओं को,
एक शहर निगल गया मेरे गांव को…

 

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ANHAD PRAKASH

NICE, VERY NICE…..!!!
AWESOME WRITTEN…!!! AND THIS IS THE TRUTH ALSO.