एक तारा देखा आसमान में छूने का मन किया

By Ankur Gupta (L&T-MHPS Boilers ) 

एक तारा देखा आसमान में छूने का मन किया , फिर न छू पाया तो रोने का मन किया

फिर मुझ में उम्मीद सी जागी की कुछ ऐसा कर जाऊंगा ,कि अब तो उस तारे को घर तक ले कर आऊंगा  |

उस तारे की चाह में मैं घर से निकल पड़ा , न जाने कितने बेगानो  में अपनो  सा बन चला

एक आस बस मन में थी की उसकी चमक से घर को सजाऊंगा , कुछ पल उससे खेलूंगा और अपनो का मन बहलाऊँगा |

बस राह में चलते चलते कुछ सपने और बून  लिये , कुछ अपनों से दूर बेगानो में भी अपने चुन  लिये

उनकी भी कमी  हमको सताने लगी बस आज नही तो कल उनकी भी याद आने लगी

 वक्त सालो में कुछ ऐसा निकलता चला गया , वोह रिस्ता कुछ रेत सा फिसलता चला गया |

आज राह में चलते चलते बस यही समझना चाहता हूँ की उस तारे की चमक में भी , मैं सिर्फ अकेलेपन का एक साया हूं, न दूर जाता मैं इतना की वो पल ना लोट पाएंगे

जिनके लिये हम यु दूर चले गये, क्या वो अब लोट  के आएंगे

जो आँचल छूट  गया अँधेरी राहों में , वो आज मुझसे पूछ रहा लोट आ घर परदेशी मेरा तारा आज  छूट रहा

आज भी वह सवाल मुझे सताता है क्या वो तारा मेरे घर में लोट  कर आता है ,

जिसके लिए मैं घूम रहा था ज़िन्दगी भर, अब उनका साथ भी हमे एक पल भी नही भाता है

अब समझ पाया वो तारा ख़ुशी का उनके साथ में था , कुछ आपके कुछ उनके  एहसास में था

एक तारा देखा आसमान में छूने का मन किया , फिर न छू पाया तो रोने का मन किया

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NICE POEM ANKUR

Anonymous

Well penned Sir.