नूर रहता है


By Sandeep Dahiya (L&T-MHPS)

 

मेरी गली में कासा लेकर घूमता था

जो अब दौलत के नशे में चूर रहता है

 

आसमान भी कहीं जमीं से मिलता है

ऊँचा उड़ने वाले क्यों मगरूर रहता है

 

ज़माने गुज़र गए हमें मयकदे गये हुए

बरसों पहले पी थी जिसका सुरूर रहता है

 

माना तेरे मकान में ऐशो आराम बहुत है

मेरे घर में मगर ख़ुदा का नूर रहता है

 

ये कैसी तेरी इंसाफ़गाह है मेरे ख़ुदा

मेरा क़ातिल हर दफ़ा बेकुसूर रहता है

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Ashish Kumar

बेहतरीन

Sandeep Dahiya

Thanks Ashish

pradeep Mittal

Nice Dahiya ji

Sandeep Dahiya

Thanks Pradeep