मैं तुझको लिख दूं, तू पढ़ती जा

By Pankul Agarwal , L&T ECC CTP-14 Project

मैं लिखता जाऊं, तू पढ़ती जा
दिल खोलकर रख दूं, ढकती जा
लिख दूं तेरी रूह की सूरत
मैं कहता जाऊं, तू सुनती जा
 
तू भोली भाली बचपन से
तू सीधी सादी है मन‌ से
नयनों में तेरे मोती हैं
मैं बीने जाऊं, तू झरती जा
 
तेरी पावन सुंदरता
होंठों से टपकी मादकता
जैसे मेघा भर दे दरिया को
तू नयनों से प्याले भरती जा
 
तेरे सच्चे मन मंदिर में
छल‌ का कोई स्थान नहीं है
मैं मीरा जैसे गाता जाऊं
दर्शन तू श्याम से देती जा
 
तू मेघ का जैसे उद्गम है
पंकज की वैसे पंक हुं मैं
जल से हम दोनों का नाता
मैं खिलता जाऊं, तू झरती जा
 
जो‌ किरण सूर्य की मुझे खिला दें
वही किरण सूर्य की तुझे गला दे
मैं खोल के बांहें‌ स्वीकार करूं
तू बादल बनकर बरसती जा
 
क्यूं शोक तेरे मुख मंडल पर
क्यूं आंखें तेरी शून्य‌ दिखें
अश्क तेरे मैं ‌‌‌‌‌कलम में भर लूं
मैं लिखता जाऊं,‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌ तू गलती जा
 
बांहों में मुझको लेले तू
आंखों से कविता कहती जा
रक्त की तेरे तरंग लिखूं मैं
धमनी में रक्त सी बहती जा
 
 
छोड़ उदासी तू मुस्का दे
बागों में फूल खिलाती जा
प्रेम कि न‌ कोई सीमा हो
हृदय में मुझको भरती जा
 
शकुन्तला का रूप जो धर ले
तो कलम मेरी बन जाए काली
महाकाव्य की रचना कर दूं
मैं तुझको लिख दूं,‌‌‌‌बस पढ़ती जा
 
~पंकुल

1
Leave a Reply

1 Comment threads
0 Thread replies
0 Followers
 
Most reacted comment
Hottest comment thread
1 Comment authors
  Subscribe  
newest oldest most voted
Notify of
Deepak Dubey

Ekdum Shandaar………… Keep Going Pankul Sir.