ज़िंदगी अपनी रौ में गुजरती गई

By Pankul Aggarwal (L&T ECC CTP-14 Project )

ज़िंदगी अपनी रौ में गुजरती गई

मैं जहां था वहीं पर थम सा गया

वक्त था के वो दरिया में डूबा रहा                                                     

तेरी धड़कन को मैं यूं ही सुनता गया

तेरी आंखों में मुझको जो राहें दिखीं

रात में ख्वाब में यूं ही चलता गया

ज़िंदगी अपनी रौ में गुजरती गई

मैं जहां था वहीं पर थम सा गया

मेरी बातों में शामिल ऐसे तू थी

जैसे दरिया में बर्फ सी तू गलती गई

कुछ हवा यूं चली रात महकी रही

तेरी सांसों में मैं यूं ही बहता गया

ज़िंदगी अपनी रौ में गुजरती गई

मैं जहां था वहीं पर थम सा गया

तेरे आंगन‌ में बचपन‌ से झूमा मैं हूं

मेरी शाखों पर चिड़ियां चहकती रहीं

रंग दीवारों के उम्र भर ही उड़ते रहे

मैं दरारें से तुझको ही तकता रहा

ज़िंदगी अपनी रौ में गुजरती गई

मैं जहां था वहीं पर यूं थम सा गया

तेरे ख्वाबों में चांद और सितारे सजे

मैंने ख्वाबों में तुझको ही दुल्हन किया

तुम चले छोड़कर मुझको तपती डगर

बादलों सा मैं सूरज को ढकता गया

ज़िंदगी अपनी रौ में गुजरती गई

मैं जहां था वहीं पर यूं थम सा गया

मैं जहां था वहीं पर यूं थम सा गया

ज़िंदगी अपनी रौ में गुजरती गई

मैं जहां था वहीं पर यूं थम सा गया

2
Leave a Reply

2 Comment threads
0 Thread replies
0 Followers
 
Most reacted comment
Hottest comment thread
2 Comment authors
  Subscribe  
newest oldest most voted
Notify of
Sandeep Dahiya

Khubsurat likha hai

shukla sanjay rajesh kumar

शानदार!!