#ए जर्नी टू होम एंड टीवी एक्सपेरीयेंस विद माह होमीज#

by Sanchit Kumar Srivastava, L&T ECC-PT&D

यूँ तो छुट्टियों में घर जाने का उत्साह हर किसी को होता है, पर ये उत्साह, डर और दर्द में तब तब्दील हो जाता है जब मिल बैठते हैं तीन यार, आपकी हंसती खिलखिलाती लापरवाह ज़िंदगी में तांडव मचाने के लिए आप, आपके मा बाप और टीवी शोज़.I

घर में मिलने वाली इज़्ज़त की मात्रा इस बत पर डिपेंड करती है की आपको आए हुए कितने दिन हुए हैं और सामने बुद्धु बक्से में कैसी हवा चल रही है,.. रगड़ाई उसी बेस पर होगी I

ये एक्सपीरियंस दिल दहलाने के लिए काफी होता है.

#पहला दिन~ जब पहले दिन आप घर पहुँचते हैं तो आपको एकदम प्रिन्स चार्ल्स जैसा ट्रीटमेंट मिलता है..क्या खाओगे..कब खाओगे ये बना ले वो बना ले …चलो कुछ ले आते हैं…इतनी भारी मात्रा में इज़्ज़त मिलती है जिसकी आपको आदत भी नहीं होती…उस टाइम तो लगता है अपुन ईच भगवान है…हाज़मा बिगड़ने लगता है…..एक आध बार तो हाउस नम्बर और पिताजी का नाम आधार कार्ड से मैच कराना पड़ जाता है कि भाई दो अनजाने के अमिताभ बच्चन की तरह कहीं ग़लत घर में तो नहीं आ गये I

#दूसरा दिन~ दूसरा दिन~ ये वो दिन होता है जब इज़्ज़त ग्रैजूअली कम होने लगती है…इस दिन टीवी का चैनल रिक्वेस्ट बेसिस पर आपसे चेंज करवाया जाता है…डायलॉग कुछ यूँ होता है “अरे भईया वो ससुराल सिमर का लगा दो, देखा नहीं हमने काफ़ी दिनो से, नागिन लगा दो “आप भी माताजी की लव्ली रिक्वेस्ट डिक्लाइन नहीं कर सकते I भाईसाहब ये ससुराल बेशक से सिमर का होगा पर मज़ाक पूरे सौरमंडल से भी कहीं ज़्यादा का है …एलीयन लेवल की बकवास दिखाते हैं… अमाँ यार ये बताओ किसकी बहु मक्खी बनके ग़ीग़ी करती है…शादी के पहले पूछना पड़ेगा , ”आ एक्सक्यूज मी आँटी जी ..आपकी बेटी में रूप बदलने का टैलेंट है…मतलब मक्खी मच्छर टिड्डा वग़ैरह बैन लेती है क्या” समझ नहि आता क्या ज़हर घोल रखा है इन लोगों ने…

ऐसे में दो ही ऑप्शन बचते हैं या तो साथ बैठकर अपनी नाज़ुक आँखो पर ये अत्याचार होने दो या फिर पूरे जोश के साथ उठो (इतना भी जोश नहीं की कुर्सी टूट जाए…सम्भालके वरना योर सेकंड डे विल बी योर लास्ट डे) और पहली फुर्सत में कमरे और घर से बाहर निकल जाओ ….उसी में समस्त मानव समाज की भलाई है… खासकर के बालक तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी..

तीसरा दिन~ 

पार्ट १~ रियल्टी शो इफेक्ट

तीसरा दिन क़यामत का दिन होता है जब आपके सारे पापों का हिसाब किताब किया जाता है…आपकी इज़्ज़त का मीटर रेड इंडिकेटर के साथ पूरी तरह नीचे आ चुका होता है…इस दिन घरवालों के “माह होम माह रूल्ज़” चलते है…

टीवी का रिमोट भी आपसे छीन लिया जाता है…क़सम से स्वर्ग के राजेश खन्ना जैसा फ़ील आउट सा महसूस होने लगता है…ये दिन एक इशारा है उस नीली छतरी वाले का की बेटा वापसी कि टिकट करा लो चाहे तत्काल में ही क्यों न करानी पड़े…करवाओ और निकलो…

इस दिन टीवी पर ज़हरखुरानी से भी कहीं ज्यादा ज़हरीले रियलटी शोज़ तांडव मचा रहे होते हैं..और कही साथ में बाग़बान आ जाए तो फिर क्या कहने…मतलब हार्पिक के साथ फिनायल पीने वाले हालात हो जाते हैं…कतई मौत ही आ जाती है एकदम…

ये रियलटी शोज़ की दुनिया में कोई भी सुखी नहीं है…रविश कुमार स्टाइल में बोलें तो “डर का माहौल है”

स्टोरीज़ में इतना दर्द क्या बोले इतना ज़्यादा दर्द की एक बार को तो स्वर्गीय मुकेश, हाँ वहीं जिनकी आवाज में बहुत दर्द था और  मुंशी प्रेमचंद को भी पेनकिलर लेनी पड़ जाए…वो भी सोचने को मजबूर हो जाएं कि भैंस की पूँछ इतना पेन तो “पूस की रात और गोदान में भी फ़ील न हुआ था”

“बहुत हार्ड भाई बहुत हार्ड”

तीसरा दिन- पार्ट २ टेरर ऑफ बागबान

 2003 में बागबान के रिलीज़ होने के पहले देश औे दुनिया के सारे बच्चे श्रवण कुमार थे…पाप तो कहीं था ही नहीं भाई…पर अमित जी की इस कालजयी रचना के बाद मा बाप की सोच और बच्चों की जिंदगी में एक क्रांतिकारी बहुत ही क्रांतिकारी बदलाव आया जो कि चाहिए भी नहीं था …

बाग़बान देखते ही घरवालों की नज़र में आप श्रवण कुमार से सीधा जैसी करनी वैसी भरनी के शक्ति कपूर बन जाते हैं…

घर में एक अलग हाइपोथेटिकल माहौल क्रीएट हो जाता है ( हाँ वही डर का)…घरवाले अपने आपको विक्टिम समझने लगते हैं…और आपको विलेन.. बात २ पर विक्टिम कार्ड खेला जाता है….अमा यार सातवीं क्लास में थे हम जब बाग़बान आयी थी…दो दिन तक घर में सन्नाटे का माहौल था…हर दूसरी बात की तीसरी लाइन यही होती थी”आजकल कोई भरोसा नहीं रह गया..किसकी औलाद कैसी निकल जाए…अब इन दोनो को ही देख लो (मेरे और मेरे भाई की तरफ़ इशारा करके) हमें तो लगता है यही न नालायक निकल जायें…ताना जी तो न्यूट्रीशियन की तरह डेली डोज़ में मिलने लगे थे…

पहले कहते थे टीवी ने बच्चे बिगाड़ दिए हमें तो लगता है टीवी ने तो हमारे माँ बाप ही बिगाड़ कर रख दिए…हमारी जेनरेशन के बच्चों की हंसती खेलती ज़िंदगी में काँटे बोने में जितना योगदान इस बाग़बान का है उतना तो हमारा ख़ुद का और मोबाइल का भी नहीं है.

चौथा और आख़िरी दिन~ 

जैसा की नाम से ही ज़ाहिर है…ये दिन चौथे से कम नहीं होता…तीसरे दिन की भरपूर बेज़्ज़ती और अपनी बची खुची लाज औ हया को समेटकर आप इस दिन वापसी का टिक्केट करा लेते हैं…इस दिन आपको फ़र्स्ट डे वाली वॉर्म फ़ील दी जाती है… बोला जाता है और एक आध दिन रुक जाओ…इस बार जल्दी आना (हमको तो लगता है ये बोलकर हाई फ़ाइव भी करते होंगे और सोंचते होंगे इस बार और नए तरीक़े से ज़लील करेंगे इसे)

बट डूड ट्रस्ट मी इट्स अ ट्रैप… ये माह होमीज अ ट्रैप…मेरी मानो तो बेटा कभी लपेटे में आ मत जाना…क्योंकि चौथे दिन अगर रुक गए तो समझ लो दिल्ली दूर है और जनरल डिब्बा यमराज की सवारी..क्योंकि टिक्केट फिर न मिलनी दोबारी…बची खुचि इज़्ज़त भी तानो के नाखूनों से खरोंचकर निकाल ली जाएगी…बता रहे हैं लिख लो..नोट कल्लो…चाहे तो पेन हमसे ले जाओ.

इस तरह से आप घर वापसी से लेकर घर से वापसी के खट्टे मीठे अनुभव लेकर दोबारा फ़ाइट मोड पर निकल पड़ते हैं…

पर आख़िर में बस अड्डे या स्टेशन पर खड़े होकर दिमाग़ में आता है की ख़ैर जो भी हो घरवालों से मिल लो तो ज़ीने की इच्छा बढ़ जाती है …बाक़ी तो बस दौड़ है दौड़……घूम फिरकर वापिस यही आना है…पहली मोहब्बत और आख़िरी कहानी यही है…सुकून भी है…तो बस यहीं है क्योकिं भाई लोग 

“ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता”

आख़िर में हैपी दिवाली सब लोग को …जो इस बार न जा सके …अगर हो सके तो अगली बार अपने घर मनाना…अपनो के साथ…तब तक जय राम जी की

#बैरागी

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Sandeep Dahiya

bahut hi khub likha hai… Very fresh modern hindi writing…