हिमालय की ओर

Surjeet Thakur, L&T NPL

कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके वीर नर के मग में
खम ठोंक ठेलता है जब नर,पर्वत के जाते पांव उखड़।

बहुत खूब कहा है किसी ने
” भ्रमण करने से मन का भ्रम मिट जाता है ”
ये कहानी शुरू होती है, लगातार 22 दिनों की बिना किसी छुट्टी के हर दिन 12-15 घंटे काम के बाद (न इतवार, न कोइ त्योहार)। “हां 22 को शाम को निकलेंगे 23-24 को ट्रैक करेंगे ”
बस ऐसा ही था कुछ प्लान।
तैयारी तो सारी थी, उसके ऊपर अपनी होशियारी थी,
जान भी सबको प्यारी थी, पर मती गई सबकी मारी थी ‘
इन लाइनों का मतलब आपको अंत तक समझ आ जाएगा।
2018-19 की भर भर के हुई बर्फबारी के बाद, अप्रैल मई में भी पहाड़ फरवरी के जैसे दिख रहे हैं।

22 मार्च 2019 दोपहर 3-3:15 बजे मैं अपने जीरकपुर के आशियाने से निकलता हूं, पंचकुला से सोलन की बस पकड़ के सोलन पहुंच गया हूं। वैसे रास्ते में दो बार फोन आ चुका है, शायद यही पूछने के लिए की कहां पहुंचा बे, कब तक आएगा। बस स्टैंड पहुंचते ही जैसे अंदर आया दो ट्रैकर पूरे झोडे फावड़े के साथ बैठे मेरा इंतज़ार कर रहे हैं। मिलने की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद आगे का प्लान डिसाइड हो रहा है। “यहां पास में एक गुरुद्वारा है, वहां खाना भी मिल जाएगा और सोने के लिए भी है ” ये हम में से किसी का दिया हुआ आइडिया है। इसको बैक-उप वाले कोने में रखा जाता है। कुल मिलाकर स्थिति ये है यहां से नोहराधार की कोई बस अब नहीं है।
चलो राजगढ़ की कोई बस देख लो।
“हां एक है, 6 बजे जाएगी और 8 बजे पहुंचाएगी।”
वैसे किसी बुज़ुर्ग ने अभी अभी बताया है कि वहां भी गुरुद्वारा है। चलो हमारा काम थोड़ा आसान हो गया।
हिमाचल में किसी गांव को जाने वाली लास्ट बस किसी वरदान से कम नहीं होती है वहां के लोगों के लिए, और कई बार हम जैसे आवारा लोगों के लिए। हर दो मिनट बाद बस रुकती है दो लोग उतरते हैं और चार और चढ जाते हैं। एकदम हाउस फूल + 30 वाला माहौल रहता है।
राजगढ़ पहुंचते ही हमने जरूरत का और कुछ खाने पीने का समान खरीदना शुरू किया। फिर गुरुद्वारे में चले गए। सुबह 6 बजे की बस है तो सब टाइम पर सो गए हैं।
नोहराधार वाली बस से बाहर देखते ही ख़ूबसूरत बर्फ की चादर में ढके पहाड़, मन में एक नई खुशी को प्रवाहित कर रहे हैं, कितना मज़ा आएगा जब उपर पहुंच जाएंगे।
सुबह पौने नौ बजे हम नोहराधार में है, और स्थानीय लोगों से ट्रैक की जानकारी इकट्ठा कर रहे हैं, लोग बता रहे हैं कि बर्फ काफी है उपर तो जमनाला या ज्यादा से ज्यादा तीसरी तक ही जा पाओगे। हम भी ठहरे ठेठ लोग निकल पड़े। दो या तीन किलोमीटर ही चले हैं कि बर्फ वाला रास्ता आ गया है। अभी तीनों लोग भविष्य से अनजान खुशी मना रहे हैं इतने जल्दी बर्फ मिल गई। थोड़े आगे चले ही हैं बर्फ कम्पलेन/हॉरलिक्स खाने वाले बच्चों की तरह बढ़ रही है, पहले आधा फीट, फिर एक फुट अब बढ़ते बढ़ते लगभग ढ़ाई फीट हो चुकी है। साथ में शिव कैलाशों के स्वामी, मेरा भोला है भंडारी, ऐसे ही महादेव के भजनों से मन में साहस भरने की कोशिश की जा रही है। अब आगे कुछ इंसानी आवाज़ सुनाई दे रही है, कुछ और पास आकर देखा तो कुछ इंसान भी दिख गए हैं।


पहली नज़र में देख कर मुझे मन ही मन लग रहा है कोई टेररिस्ट ग्रुप यहां कैंपिंग करके बैठा है, क्योंकि अभी तक रास्ते में हमें कोइ नहीं मिला , बीच में बुझी हुई आग के कुछ अवशेष मिले हैं बस, मैं अपने डंडे को थोड़ा कस कर पकड़ लेता हूं, आमने सामने वाली कोई स्थिति आती है तो थोड़ी देर मुकाबला कर ही लेंगे। पास आकर पता चला है, कि ये भी मुसाफिर ही हैं, हमारी तरह। जो कि देहरादून के रहने वाले हैं और ये लोग पहले भी चुरधार जाने की असफल कोशिश कर चुके हैं, और इस बार असफल नहीं होना चाहते ।
अब स्थिति यह है कि यहां से आगे ना कोइ रास्ता दिख रहा, जिसके कारण ये लोग पिछले दो घंटों से यहां बैठे हुए हैं। आगे एक खड़ी चोटी है दोनों तरफ ढेर सारी बर्फ।
इन लोगों ने अभी कुछ देर पहले ही पहाड़ी के बाईं तरफ से आगे जाने की कोशिश की थी जिसमें इनका एक साथी फिसलते फिसलते 5-10 मीटर नीचे चला गया था, वो तो उस पेड़ का शुक्र है कि उसमें रुक गया वरना संभावनाएं और भी बहुत थीं।
अब हम हो गए हैं सात लोग, होंसला बढाने के लिए बहुत है। थोड़ी मंत्रणा के बाद तय होता है कि दाईं तरफ से आगे बढ़ते हैं, दो लोग पहले आगे जाएंगे ये देखने की आगे बढ़ने की कोई उम्मीद है या नहीं। थोड़े आगे जाते ही हमें घोड़े की लीद दिख गई आगे पैरों के काफी हल्के निशान।

“आ जाओ ,
रास्ता मिल गया है आगे का”।
बस अब शुरू होता है बर्फ से असली महायुद्ध।
सच्ची बात यह है कि आगे कोइ रास्ता नहीं है कुछ झाड़ियां और बड़ी चट्टानें हैं उसके ऊपर हमारे भारी भरकम झोले। अब पहली चट्टान को फतह करने की कोशिश की जा रही है, उसके ऊपर कुछ झाड़ियों की जडें हैं जिनको सीढ़ी समझकर हम एक एक फीट ऊपर चढ़ने लगे है, पहले में उपर जाता हूं अपना बैग रखकर एक एक करके साथियों को ऊपर खींच रहा हूं। चलो ये तो पार हुई, अब अगली चट्टान, पिछले वाली से बड़ी है, पहले बैग उपर पहुंचाया जाता है फिर उसके मालिक को खींचा जाता है।
पहाड़ों में रहने से चट्टानों पर चढना खून में बस जाता है, वही अक्सर पहाड़ों पर काम आता है।
मुसीबतें अभी पूरी तरह से शुरू नहीं हुई हैं, पर सूर्य देव पूरे जोश के साथ हमारे साथ बने हुए हैं अब तक यही सबसे अच्छी खबर है।
आगे सीधा रास्ता है, सफेद बर्फ से ढका हुआ इतना सुंदर लग रहा है मानो जन्नत यही हो। सुनने में अच्छा लग रहा होगा। पर मुसीबत कुछ और है, यहां बर्फ की गहराई,4-5 फीट है । पहले एक कदम रखते हैं फिर डंडे पर बैलेंस बनाया जाता है ताकि पिछले पांव को बर्फ से उपर खींचा जाए। यूं तो हम जूतों में बर्फ/पानी ना जाने देने के लिए पूरी तैयारी कर के आए हैं, लेकिन जिस टेक्निक के लिए थोड़े देर पहले हम अपनी पीठ थपतपा रहे थे वो फेल हो गयी है।वैसे हम प्लास्टिक की थैलियां मोजों के बाहर पहन के चले हैं, अब बर्फ इतनी है कि उसने ने भी घुटने टेक दिए हैं , अब बर्फ अंदर तक जा रही है, पांव में फील होना फिलहाल कम हो रहा है। हाइपोथर्मिया को मध्य नजर रखते हुए हर 50 मीटर पर किसी पत्थर पर रुक कर, जूते खोल कर जुराबों को निचोड़ा जा रहा है, और साथ में एनर्जी के लिए चने काजू बादाम का सेवन हो रहा है। ये मत सोचिए की पानी ना होने पर भी हम दोनों काम एक साथ कैसे कर रहे हैं। बर्फ से हाथ धोकर देखिए कभी समझ जाएंगे।
अब कुछ लोग आगे की चढाई देख कर वहीं रुकने की बात कर रहे हैं, पर इसके लिए काफी देर हो चुकी है।


“पानी है क्या थोड़ा सा” किसी ने पूछा
जवाब मिला
“नहीं
आस पास बर्फ है बोतल में डाल के थोड़ी देर छलका दो ”
हां कुछ तो मिला,
और इधर मैं बर्फ़ मुंह में रख कर शरीर की गर्मी से उसे पिघलाने का सफल परीक्षण कर रहा हूं, काफ़ी हद तक समाधान मिल गया है, आगे पूरे रास्ते यही करना होगा।
अब हमें 75-80 डिग्री की सर्पिली चढाई चढनी है, और अधिकतर लोगों की सांसे तेज हो चली है। वैसे सीधे रास्ते में चलते हुए मैंने जोश जोश में कह दिया था अभी 3:00 बजे हैं अगले दो घंटे में ऊपर पहुंच जाएंगे। पर जो हालात बन रहे हैं उससे 6:00 बजे पहुंचने में भी संशय है। ऐसे ही नहीं लोग किसी कठिन काम को पहाड़ चढने की संज्ञा देते हैं। और हमारे लिए तो,
ये पहाड़ नहीं आसान, बस इतना समझ लीजिए
बर्फ़ की चादर है, और पैदल चल के जाना है।

नीचे वाली बर्फ थोड़ी ठोस है ऊपर वाली मुलायम और कोई रास्ता ना होने की वजह से हम एक एक करके , पांव से दो तीन बार बर्फ़ को दबा कर रास्ता बना रहे हैं, इसी कोशिश में तीन बार तो मेरा पांव इतना धस गया है कि ऊपर निकालने के लिए साथ वाले की मदद लेनी पड़ रही है। नीचे से देखने में लग रहा है ऊपर समतल जमीन होगी।
जैसे तैसे रेंगते, गिरते पड़ते हम ऊपर पहुंच गए हैं। अब इस बेजान शरीर जो बचा कुचा विश्वास है वो भी डगमगा गया है , ऐसा लग रहा है, मानो बर्फ कह रही हो,
” चलो अब खेला शुरू किया जाए ”
अभी तक की चढ़ाई जिसे हम अपनी सबसे बड़ी फतह मान रहे हैं वो भी छोटी लग रही है आगे सिर्फ सौ मीटर का सीधा (रास्ता बनाने योग्य स्थान) है। उसके आगे कुछ नहीं। बड़ी बड़ी चट्टाने (हमारी पिछली कोशिशों से चार गुणा बड़ी ), जिसमें चढ़ने का कोई साधन नहीं है दोनों तरफ गहरी खाई।
अब हम “आगे खाई पीछे कुआं ” कहावत वाली स्थिति में हैं। इसमें घी डालने का काम कर रही हैं ये तेज सर्द हवाएं,
“शाम होने को है लाल सूरज पहाड़ों में छिपने को है ….हम कहां जाएंगे “
बिल्कुल यही लग रहा है ,5:45 बज चुके हैं, और मंजिल अभी दूर है। अब सामने वाली एक चट्टान पर चढ़ कर में आगे के रास्ते का मोइना कर रहा हूं, मन में बस एक बात है जिंदा बच के जाना है। डर सबको लगता है, पर उस डर जीने और उसको पार करने का जो मज़ा है वो किसी और में नहीं। जहां एक ओर जिंदगी का खेल चला है, वहीं दूसरी ओर मन फिर भी कुछ अलग खुशी महसूस कर रहा है, ना जाने क्यों।चट्टान से पहली चीज जो दिखती है वो है मन्दिर, शिव मूर्ति से 1 किलो मीटर दूर, उसके बाद वहां एक आदमी शायद यही था खुशी का कारण।
अभी तक हम ये सोच के चले हैं कि मन्दिर मूर्ति के बगल में है तो अपना टारगेट बस मूर्ति है, टूटे हुए होंसले को बिखरने से बचाने के लिए ये बात में अपने तक ही रखता हूं, जब तक मूर्ति के पास ना पहुंच जाए।

जान बची तो लाखों पाए, उसी जान को बचाने के लिए अब उसको खतरे में डालने का निर्णय होता है, इसके दाईं ओर से नीचे जाएंगे और फिर ऊपर चढ़ने का प्लान बनाया गया है। जो जगह चढ़नी और उत्तरनी है वो एकदम तिर्यक है जैसे हिल स्केटिंग होता है। बर्फ का मुलायम होना फायदेमंद लग रहा है, पैर जो इसमें धस रहे हैं वही जान बचाने का काम कर रहे हैं इससे गिरने का खतरा काफी कम हुआ है। एक चट्टान पार की दूसरी चट्टान सामने खड़ी मिलती है। और मेरा सबसे बड़ा मोटीवेशन अपना तिरंगा कहीं गिर गया है , इन हवाओं के बीच उसे ढूंढ़ पाना नामुमकिन सा है तो कोशिश छोड़ दी जाती है।

अब हवाओं में बर्फ़ भी उड़कर मुंह पर लग रही है और इसी बीच हम महादेव की मूर्ति तक पहुंच गए हैं। अब लोग मंदिर ढूंढ रहे हैं, सबको सच्चाई बताई जाती है, किसी को विश्वास नहीं हो रहा, अब मैं मंदिर के पास वाली इमरजेंसी लाइट जो दिख पा रही है उसका हवाला देते हुए उनको समझाता हूं और सीधे आगे चलने के लिए बोलता हूं,
” अब इतनी मेहनत करके यहां तक पहुंचे हैं और एक फोटो भी ना निकाले , लोगों को कैसे बताएंगे की हम टॉप तक पहुंच के आए हैं ” ।
दो मिनट में फोटो सेशन भी हो गया।

अब हालात ये हो गई है कि पांव फिलहाल फीलिंग लैस हो गए हैं, नीचे चलने के लिए मैंने तीन कदम ही बढ़ाये हैं पीछे से आवाज़ आती है
” सर आपका जूता ”
में पीछे देखता हूं फिर अपनी पांव को देखता हूं।
अपने चले हुए दो कदम में मुझे ये तक महसूस नहीं हो पाया कि जूता कब निकल गया। यही घटना उतरते हुए फिर घटती हैं।
अब नीचे के लिए ढलान है कोई गिरेगा तो सीधा ऊपर ही जाएगा।
अब संभाल के चल तो रहे हैं पर जान अभी भी गले में अटक के रह गई है।


अब तक का सबसे मुश्किल आधा घंटा… आने वाला था।।
सर्द हवाओं ने अपना रूप बदल कर बर्फीले तूफान का रूप धारण कर लिया है। रोशनी अपने न्यूनतम स्तर पर जा चुकी है
ढलान को पार कर अब हम समतल जगह पर हैं जिसके दूसरी ओर गहरी खाई है। तूफान का दौर इस कदर जारी हैं मानो ट्रैकिंग के साथ पैराग्लाइडिंग भी यहीं करवा दे, अब भला हो इन भारी झोलों का, कि हम जमीन पर हैं वरना उड़ने के सारे शौक़ यहीं पूरे हो जाते। अब खतरे को भांपते हुए मैंने शुभम विजय का हाथ पकड़ लिया है, वरना हवाएं आज कुछ और सोच कर बह रही हैं। सच बताऊं तो खतरा सिर्फ विजय का नहीं हैं मैं खुद भी हवा के झोंके में झूल रहा हूं। अंकित हमसे थोड़ा ही आगे है और बाकी चार देहरादून वाले साथी पीछे हैं।
आगे फिर हल्की ढलान है, अचानक विजय का जूता निकल जाता है । पांव तो पहले ही संवेदनहीन हो गए थे, तो उससे पांव से कोई जोर नहीं लग रहा है,अब जूते को कैसे पहना जाए ये मुश्किल है, जूता भी इतनी बर्फ के बीच जम गया है उसपर पहले जो बर्फ़ पिगल कर पानी बन गई थी वो अब जूते को तले हुए पकोड़े की तरह कड़क बना गई है। मैं अब दोनों हाथों से जूता पहनाने की कोशिश कर रहा हूं, पर कोई बात नहीं बन पा रही, उसके उपर विजय का रोना,” मुझे घर पहुंचा दो बस ”
अंकित भी साथ में है हम दोनों बची हुई पूरी ताकत लगा रहे हैं कोई असर नहीं हो रहा, साथ साथ हम जोर जोर से चिल्ला भी रहे हैं, ताकि अंधेरे में पीछे वाले लोग भटक ना जाएं
“इधर से आओ , मन्दिर दिख रहा है, कॉम आन, हम पहुंच ही गए हैं ”
जितना हो सके लोगों का हौंसला बढ़ाने की कोशिश की जा रही है, मन में इष्ट देवता का नाम जप रहा हूं, कुछ तो हो जाए।
पांच मिनट के उस भयावह स्थिति के बाद शिरगुल महादेव हमारी बात सुन लेते हैं, जूता लग गया है, अब मैं उल्टे तरफ मुंह करके विजय को खींच रहा हूं।


अब मन्दिर सामने दिख रहा है, विजय की जान में जान आ गई, वो नीचे भागने लगा है, मैं पीछे वाले साथियों को देख रहा हूं, हां उनके आने की आहट सुनाई दे रही है, दिल जोर जोर से धड़क रहा है, हम जोर से हर हर महादेव के नारे लगा रहे हैं ऐसा लग रहा है मानो सारा डर हमारे जयकारे के रूप में बाहर निकल रहा हो। थोड़ी देर में मेरा मुंह बर्फ के बीच , बैग सिर पर और पांव पीछे, शायद इसी को मुंह की खानी कहते हैं। पर अब जान सुरक्षित है इस बात का विश्वास हो गया है, हमारी चीख पुकार सुनकर सराय का चौकीदार बाहर आ गया है।

इस दो मंजिला सराय में, जिसकी निचली मंज़िल पूरी तरह बर्फ़ में है, और ऊपर की मंजिल का हल्का सा अंश दिख पा रहा है , बस इतना ही यहां पर पड़ी बर्फ की गहराई का अनुमान लगाने के लिए काफी है।

अंकित द्वारा दिखाया गया हौंसला काबिले तारीफ़ था, और शुभम विजय ने भी वीरतापूर्वक हर मुश्किल का सामना किया, देहरादून के साथियोंं ने भी पूरा दम खम लगाया, यह एक अभिस्मार्निय यात्रा थी।

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