किरण

किरण हूं मैं
सूर्य की किरण हूं मैं

मुझसे ही है रोशनी, हूं चंद्र की मैं चांदनी
पृथ्वी जीव मुझसे है, वृक्ष का पवन हूँ मैं

किरण हूं मैं
हाँ सूर्य की किरण हूं मैं

जो लौ दीप में जले, अन्धकार से लड़े, उस सूत का कपास हूं, लौ का मैं प्रकाश हूं
देव को जो शक्ति दे, दानवों से लड़े, शुद्धि को हवन हुआ, उस कुंड का अंगार हूं
जीव हो या मृत हो, देव की जो देह हो, प्रतिरूप हूं प्रतिबिंब हूं, प्रकट का प्रमाण हूं
नेत्र को जो दृष्टि दे, ब्रह्म को दे लेखनी, उस नेत्र की मैं ज्योति हूं, लेख का प्रमाण हूं

ना सूत का कपास हो, ना लौ का प्रकाश हो
न यज्ञ का यह काष्ठ हो, ना दानवों का नाश हो
बिन मेरे ना बिंब हो, ना देह का स्वरूप हो
ना दृश्य हो, ना लेख हो, ना ज्ञान की यह ज्योत हो

मैं रंग हूं, मैं चित्र हूं, मैं दृश्य हूं, आकार हूं
मैं तूलिका, मैं लेखनी, मैं ज्योति का प्रमाण हूं, ब्रह्म का मैं ज्ञान हूं|

किरण हूं मैं
सूर्य की किरण हूं मैं

अंध में प्रकाश दे, दृश्य का आभास दे, रात्रि का विनाश हूं, मैं चंद्र का प्रकाश हूं.
सतित्व को जो आस दे, व्रत का परिणाम दे, वो चौथ व्रत मुझसे है, मैं नारी का श्रृंगार हूं
रात्रि में प्रकाशमान् चंद्र का गुमान हूं, अंध में जो राह दे पथिक का परकार हूँ
शिव चंद्र के मुकुट मणि पर विराजमान मान हूं, मैं वर्धमान-चाँद हूं

बिन मेरे ना रोशनी, ना चन्द्र की यह चांदनी,
ना व्रत हो ना पर्व हो, ना प्रेम का यह भाव हो
बिन मेरे ना पूर्णिमा, ना अंध का विनाश हो
बिन मेरे ना वर्धमान, ना चंद्र का गुमान हो

मैं चांदनी, मैं पर्व हूं, नारी का मैं स्वर्ग हूं
मैं पूर्णिमा, मैं रोशनी, मैं ही शिव का चंद्र हूं

किरण हूं मैं
हाँ सूर्य की किरण हूं मैं

दूब धूप में खिले, गौ का आहार हूँ कृष्ण ने जो पिया, उस दुग्ध का आधार हूं
जन्म से मृत्यु तक, भोज से वस्त्र तक ब्रह्म का सृजन है जो, उस पृथ्वी का भी सार हूँ
जो मेघ नदीश से उठे, चले मरू में गिरे, उस मेघ का मैं स्रोत हूं, जल का भी प्रवाह हूं मैं!
मनुष्य की जो अस्थियां पंचतत्व में मिलें, उस मनुष्य का उद्धार हूं नदिया की जल धार हुँ,

बिन मेरे न दूब हो, न खान हो न पान हो
न जीव हों, न प्राण हों, न वृक्ष हों न चाल हो
बिन मेरे ना मेघ हो, ना मेघ का यह स्रोत हो
ना नीर हो, ना चीर हो, ना नाद जलधार हो

मैं दूब हूं, मैं धूप हूं, जीव का मैं प्राण हूं
मैं नीर, हूं चीर हूं, मनुज का उद्धार हूं

किरण हूं मैं
सूर्य की किरण हूं मैं

जो वायु वृक्ष से मिले, जीव जिससे श्वास ले, उस वृक्ष का मैं स्रोत हूं, वायु और श्वास हूं
जीव जिससे तृप्त हों, ईश का जो भोग हो, वह कंद_मूल_फल भी हूं, जल और किरण भी हूं
चिता हो, यज्ञ हो या हो पर्व होलिका, अग्नि का जो स्रोत है, उस काष्ठ का मैं प्राण हूं,
नारी का मैं मान हूं, सीता का सम्मान हूं, पद्मिनी के गर्व का मैं ज्वलंत प्रमाण हूं

बिन मेरे ना वृक्ष हों, ना वायु हो, ना श्वास हो
ना जीव का भोज हो, ना देव का प्रसाद हो
बिन मेरे ना दाह हो, ना दहन हो होलिका,
ना सीता का मान हो, ना पद्मिनी की आन हो

मैं वायु हूं, मैं श्वास हूं, सृष्टि का मैं प्राण हूं
अग्नि हूं, ज्वाला हूं, मोक्ष की पद्धति, ब्रह्म का मैं मार्ग हूं.

किरण हूं मैं
हाँ सूर्य की किरण हूं मैं

~पंकुल अग्रवाल

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Tanushree

Ek shabd KO lekar poori kavita likhi h, bot sundar!

Atul

Well done