श्रीकृष्ण आह्वान


By: Mr. Atul Sehgal (LTSL)

श्रीकृष्ण आह्वान

कृष्ण कन्हैया , एक बार फिर आओ,

माया में लिप्त जग के प्राणी  को,

आलौकिक  शाश्वत सुख का आभास कराओ,

एक बार फिर आओ।

पृथ्वी लोक पर समय अच्छा  है नहीं,

अन्याय आतंक का जोर हर कहीं,

इस पाप और दुःख की आंधी को रोक,

सुख और शांति की वृष्टि करवाओ,

एक बार फिर आओ ।

भारतभूमि  पर बुरी नज़र रखते हैं आतंकी दुष्ट,

भद्रजन क्षीण हो रहे, भ्रष्ट  हो  रहे पुष्ट ,

इस विषम वातावरण को आकर सामान्य बनाओ,

एक बार फिर आओ।

तुमने तो धर्मयुद्ध द्वारा  धर्म पताका फहराई  थी,

दुष्ट, पापी जनों का नाश कर,

प्रेम, सद्भावना की बयार चलायी थी।

आज आकर फिर से इस वसुंधरा पर,

न्याय, शांति की व्यवस्था करवाओ,

एक बार फिर आओ।

आज भी भारतवर्ष में गौमाता का सम्मान नहीं,

गौसंवर्धन पर जो अपेक्षित है वह ध्यान नहीं।

तुम तो सब जानते हो,

सब कुछ देख रहे हो,

फिर क्यों नहीं आते?

एक बार फिर से आओ,

इस उपेक्षा पर रोक लगाओ ।

आज की स्थिति  बड़ी है विकट,

धर्म पर छाया है गहरा संकट,

धर्म के नाम पर पाखंड चलते हैं,

अज्ञान और भ्रान्ति में लोग उलझते हैं।

तुमे तो सन्देश दिया कर्मयोग का,

आज मानव बन गया दास भोग का,

वह फल  निर्धारित करके कर्म करता है,

फिर असफल होने पर अशांत विचरता है,

आज कूटनीति दुष्टों का हथियार है,

भ्रष्टों के हाथ में तलवार है ।

गीता में तुमने दिया सात्विक जीवन का उपदेश,

आज रजस तमस  दे रहा मानव को क्लेश।

प्यारे कृष्ण , एक बार फिर आओ,

मनुष्य को शुद्ध व्यवहारिक ज्ञान दे जाओ,

सोये हुए कलियुगी मानव को जगाओ,

एक बार फिर आओ।

वर्तमान भारतवर्ष गंभीर समस्याओं से ग्रस्त  है,

भ्रष्टाचार, प्रदूषण, अराजकता से सामान्य नागरिक त्रस्त  है.

चोरी में लिप्त अधिकारी, दलाली में लिप्त राजनेता,

झूठ से फलता व्यापारी, मौलिकता से दूर अभिनेता ।

प्यारे कृष्ण, भारत का दुर्भाग्यकाल  समाप्त करो,

एक बार फिर आकर समस्त दोष हरो ।

आज देश की विचित्र हालत है भैया;

राष्ट्रवादी सरकार है पर डोलती है राष्ट्र नैया।

अच्छी मंशा के होते भी पंगु दिखती है सरकार,

राष्ट्रविरोधी शक्तियां हावी लगती हैं फिर इस बार.

 

घोटालों की सरकार तो गयी पर बदलाव की आंधी नहीं उमड़ती,

देश की मिटटी और हवा से धर्म की सुगंध नहीं आती !

धर्म के दस लक्षण रहे जिस देश की धरोहर,

वहां क्यों हो अधर्म बलवान,  क्यों न हो दंड का डर ?

 

देखते हैं आये दिन बलात्कार का हाहाकार ,

असहायों, अबलाओं के साथ होता अमानवीय व्यवहार.

धर्म और धार्मिकता के नाम पर हो रहे व्यभिचार,

ग्रंथपन्नों में सिमट चुके धर्म संहिता और आचार।

 

आज देश में दीखते हैं संत कम और अधिक ढोंगी बाबा ,

बुद्ध और गाँधी के देश में अशांति और खून खराबा?

जनता और सरकार–दोनों का एक दुसरे पर अविश्वास ,

राजनेता स्वयं को कहते आम आदमी पर जीवन शैली रखते खास I

 

हे कृष्ण, मुक्ति के आनंद से  निकल,एक बार तो आओ,

धर्म, ज्ञान और आनंद की सही व्याख्या  कर जाओ,

सोये हुए कलियुगी मानव को जगाओ,

एक बार फिर आओ !

एक बार फिर आओ !