एक गुलाब छोड़ आया


By: Sumit Singh  ( LT MHPS )

rose 1

 

ज़िन्दगी में, ये कैसा मुकाम आया,

एक अजनबी को में, अपनी जान सौंप आया

 

वो कुचले, मसले या लगा ले होठो से,

में चोखट पे उसकी एक गुलाब छोड़ आया

 

इश्क की दरख्तों पे काटे बहुत ज्यादा है

में चढ़कर उसकी खिड़की तक पैगाम छोड़ आया

 

क्या होगा हश्र  मेरी गुमनाम मोहब्बत का,

में बेपरवाह, खुदा पे अंजाम छोड़ आया

 

दिल बहुत उदास है तेरे इनकार के बाद

में लिखकर खत में “खुदखुशी” उस पे इल्जाम छोड़ आया

 

कहती  थी आउंगी  शब् -ऐ  -हिज्र में एक बार “सुमित ”

इसी उम्मीद पे में, दरवाजा खुला छोड़ आया

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