दो बूँद नमक


सुमित सिंह (L&T-MHPS)

रतनेश की बिटिया पांच रोज से बराबर बुखार में तप रही थी। शहर जाकर इलाज कराने के पैसे नहीं थे और गांव की सस्ती दवाई से कुछ असर नहीं हो रहा था। रतनेश माथे पर ठंडी पट्टिया रख कर लल्ली को और अपने दिल को दिलासा दे रही थी।

बुखार ने दो चार दिन में ही शरीर की पूरी जान खींच ली थी। लल्ली की पसलियां निकल आयी थी। थोड़ा बहुत जो भी खाती, सब पलट देती थी। किसी रईस के घर होती तो एक ही इशारे पे फल जूस व् नमकीन दलिया सब हाजिर हो जाते पर बदनसीब पैदा भी हुई तो एक गरीब शराबी के घर में। जब कुछ खाने की इच्छा होती, तभी रतनेश चूल्हे की राख से भुनी हुई सकरगंदी निकाल कर दे देती थी।

सुबह के पांच बजे थे रतनेश आँखे बंद किये बिटिया के पास लेटी हुई थी। तभी बाहर दरवाजे पर धड़ाम से कुछ गिरने की आवाज हुई। रतनेश ने सतर्क भाव से अपने कान खड़े किये पर उसे दोबारा कोई हलचल न सुनाई पड़ी। उसने चादर से बाहर अपने पैर निकाले और सिरहाने के पास पड़ी अपनी चप्पल पहनकर बाहर आ गयी। सामने उसका पति रोहताश पड़ा था।

रोहताश एक लकड़ी की टाल पर लकड़िया ढ़ोने का काम करता था। एक सौ अस्सी रुपये दिन के कमा लेता था। रोहताश की कमाई तो बुरी न थी पर संगत बहुत बुरी थी। दो वक़्त के खाने की कमाई एक वक़्त के पीने में ही उड़ा देता था। इसी वजह से घर पर चटनी रोटी के भी लाले रहते थे। रात भर बब्बन की बिजली (ट्यूबवेल) पर चोकड़ी बैठा करती थी। वही पीते, खाते, धुत होके सो जाते।

रतनेश ने भागकर अपने पति को उठाया और सहारा देते हुए कमरे तक ले आयी अंदर पड़ी दूसरी चारपाई पर लेटा दिया और खुद बाहर चबूतरे पर आकर बैठ गयी। अपना माथा पकड़ कर बोली “हाय री किस्मत”

अब दिन पूरी तरह चढ़ आया था रोहताश सर खुजाते बाहर निकला। “यहाँ क्यों बैठी है, लल्ली की तबियत ठीक नहीं हुई अभी” -लल्ली की माँ से बोला

“तुम्हें क्या पड़ी है हम जिए या मरे तुम रहो अपने संतरे के रस में मगन” -रतनेश

“नहीं री, कौन बोला तुझे अब कहा पीता हूँ मैं, जब से डॉक्टर साहब ने हिदायत दी है तब से तो एक धेले का खर्चा नहीं करता इस जहर के लिये। कल तो पड़ोस के गांव में लकड़िया पहुँचानी थी इस वजह से घर नहीं आ सका। शादी थी बनियो के यहाँ, बड़ा ही शानदार इंतजाम था, खाने से लेकर बारातियो के रुकने तक। रात न तंदूर बंद हुआ न अलाव”

“मुझे क्या मतलब, नसीब अपना” -रतनेश बोली

“अपनी बिटिया की भी कुछ ख़ैर खबर है पांच रोज से झुलस रही है एक इक्कनी भी हथेली पे रक्खी है दावा दारू के नाम की”

“मालिक हिसाब ही नहीं करता समय से, काम तो कोल्हू के बैल की तरह करवाता है पैसे देने के नाम आज कल -आज कल करता है”

रतनेश बोली “अब शहर जाये बिना बात न बनेगी तुम बेटी की मजबूरी बता कर पैसो का हिसाब कर ही आओ”

“अगर ऐसी बात है तो मालिक के भरोसे रहना ठीक नहीं । तुम्हारे पास जो एक दो चीज पड़ी है मुझे दे दो सुनार के पास गिरवी रखकर पैसे ले आता हु जब तनख्वा के पैसे मिलेंगे तो चूका देंगे” रोहताश ने कहा

रतनेश जाकर संदूक से अंगूठी और एक जोड़ी बिछुआ ले आयी

“ठीक है में अभी गया और तुरंत ही आ रहा हूँ, तुम कुँजी ताला लगा कर तैयार रहो” रोहताश ने कहा

रतनेश ने बिटिया को आँगन में लाकर लेटा दिया और रोहताश की बाट देखने लगी। सूरज सर पे चढ़कर उतर भी गया पर रोहतास का कोई अता पता नहीं। अँधेरा हो गया था। रतनेश ने एक दीया जलाकर उसारे में रख दिया।

जब कोई इंसान दीया जलाता है, तब वो एक उम्मीद भी बांध लेता है कि यह दीया अँधेरे में उसका सहारा बनेगा। इसीलिए वो इंसान हर विषम परिस्थिति में उसकी रक्षा करता है। बुझना दिये की नियति है पर जलाने वाले को यह आशा जरूर रहती है कि दीया बुझने से पहले मैं सो जाऊंगा।

किन्तु रतनेश का दीया उसके सोने से पहले ही बुझ गया।

रात के आखिरी पहर में अब भी कुछ घड़िया शेष थी इस समय लोगो की नींद कच्ची होने लगती है। रतनेश की चीख – पुकार सुनकर लोग एकत्र होने लगे। आस -पास की औरते रतनेश को घेरकर बैठ गयी । कोई इसे भगवान् का अन्नाय कह रहा था तो कोई सुबह को मनहूस कह कर कोस रहा था और बेसुध रतनेश -हाय मेरी बच्ची, हाय मेरी लाली।

तभी बाहर दरवाजे पर धड़ाम की आवाज हुई, रोहताश पड़ा था फिर पी कर आया था। कुछ लोग उठाने के लिये आगे बढ़े, पर आज वो भी ऐसा गिरा कि किसी के उठाने से न उठा । सुबह को मनहूस कहने की एक वजह और हो गयी ।

रतनेश का शरीर सुन्न, कलेजा बैठता जा रहा था। दो आघात लगने के बाद उसकी क्या हालात रही होगी, ये लिख पाना मुश्किल है। बस कल्पना ही की जा सकती है।

बेशक मन ही मन वो अपने पति को अपनी बेटी का हत्यारा मान रही होगी पर उसकी आँखों से बहते आंसुओ में “दो बूँद नमक” की, उसके नाम की भी जरूर होंगी।