शब्द


By Anubhav Mishra (L&T Gulf)

 

कहाँ  ढूंढूं  उन  शब्दों  को

जो  कभी  मेरे  ज़ुबान  तक  आए  थे

बस  सोचता  रहा  की  तुम

कभी  मुड़  के  तो  देखो

की  अपने  आँखों  से  ही  तुम  इन्हे  पढ़  पाते

 

ये  वो  शब्द  थे

जो  कई  दिनों  से  कहीं   छुपे  थे

शायद  कहीं  सवारने  मैं  लगे  हुए  थे

सफर  जो  करनी  थी  उनको  लम्बी

मेरे  दिल  से  मेरे  ज़हन  तक

मेरे  ज़हन  से  तेरे  दिल  तक

 

ज़िद्दी  तो  थे  वो

शर्मीले  भी  थे

तुमको  देखते  ही  जैसे

किसी  नटखट  बच्चे  की  तरह

दिल  के  किसी  कोने  में  छिप  जाते  थे

 

और  में

फिर  ढूंढ़ता  रेहता  था

घंटों  उन  शब्दों  को

कितनी  रातें  दिन  हो  गयीं

कितने  दिन  रातों  में  बदल  गयीं

 

कितने  किताबों  के  पन्नो  में  ढूंढ़ता  रहा

रेडियो  के  गानों  के  लब्ज़ों  में  ढूंढ़ता  रहा

बारिश  में  नाचते  उन  प्रेमियों  के  चेहरों  में  ढूंढ़ता  रहा

अपनों  से  अलग  उस  फौजी  के  आँखों  में  झांकता  रहा

 

उन  शब्दों  के  जैसे  तो  कई  मिले

पर  वो  न  मिले  जिनका  तलाश  था

उन  शब्दों  के  नक़ल  तो  बहुत  मिले

पर  वो  न  मिले  जो  मेरा  अपना  था

 

सोचता  हूँ  दे ही   देता  उन  शब्दों  को

तेरे  दिल  के  हथेली  पे  रख ही  देता  उन  बातों  को

तू  भी  हस्  कर  भले  इनके  वजूद  को  मार  ही  क्यों  न  देती

पर  उन  शब्दों  को  एक  बार  जीने  तो  दे  देती !

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