The Diary Of A GET – Part 1


By Kirti Vardhan (NSBU, HCIC, WDFCC –  CTP 3R Project, Mehsana, Gujarat)

 

[Disclaimer:  इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। कहानी में उपयोग हुए सभी पात्र, स्थान, L&T प्रबंधन के सभी पात्र – उनके हिरार्की और परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में किसी घटना से संबंध होता है तो इसे महज संयोग हीं माना जायेगा। इस कहानी श्रृंखला का उद्देश्य केवल मनोरंजन है, जिससे लेखक सामान्य तौर पे एक GET के शुरुआती दिनों की याद ताजा कराने की कोशिश मात्र कर रहा है।]

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आप का अरमां, आप का नाम, मेरा तराना और नहीं।

इन झुकती पलकों के सिवा, मेरा ठिकाना और नहीं।

जँचता हीं नहीं आँखों में कोई, दिल तुमको हीं चाहे तो क्या कीजिये।।

ओ मेरे…. दिल के चैन….

रेडियो मिर्ची पे पुरानी जीन्स कार्यक्रम में किशोर दा के इस बेहतरीन नगमें को सुनते हुए कमल ने अपने B.Tech के हमसफ़र Nokia1100 में टाइम देखा तो रात के साढ़े इग्यारह बज चुके थे। खिड़की के बाहर सावन की हल्की बारिश की बूंदे भी बाहर रखे लोहे के देसी कूलर की चादर से टकराकर शुभरात्रि बोलने की तैयारी में थी। कल का दिन बहुत महत्वपूर्ण औऱ मेहनती होने वाला था कमल के लिए। क्योंकि परसों दिन शनिवार को HOD पाण्डे सर के समक्ष कमल को NTPC शक्तिनगर पावर प्लांट के सातवें अतिरिक्त 2000मेगावाट यूनिट के कॉन्ट्रैक्ट कंडीशन्स पे प्रेजेंटेशन देना था। कमल ने सोचा सोने से पहले कल के पहनावे की तैयारी कर ली जाय। झटपट एक शर्ट के ऊपर हल्का आयरन घुमाया, तभी याद आया ऑफिस से शाम को आते बखत बारिश से जूते भींग गए थे। अपने रूम के सहपाठी को झकझोर के जगाकर कमल ने शूपोलिस कहाँ रखा है?पूछा और फटाफट जूते भी रेडी करके सोने को चला।

सुबह 7के करीब कमल अलार्म के साथ उठकर ऑफिस के लिए तैयार हुआ। कमल अपने पाँच अन्य GET मित्रों के साथ फरीदाबाद में सराय चौक पे L&T मेन कैंपस से 10मिनट की दूरी पर सेक्टर 37में एक फ्लैट में रहता था। रूम से निकलकर तेज कदमों से चलते हुए ऑफिस के रास्ते में कांवड़ियों की टोली ने उसको मथुरा के गोवर्धन परिक्रमा की याद दिला दी। ऑफिस मुख्य द्वार पर हाजिरी पंच करने के बाद कमल तीसरी मंजिल पर अपने सीट पर पहुंचकर कंप्यूटर सिस्टम ऑन किया और अभी तक के अपने कॉन्ट्रैक्ट को पढ़ के बनाये गए नोट्स को सरसरी निगाह से देखा। आज दिन भर की प्लानिंग की, फिर कॉफ़ी मशीन की तरफ लपका। जुलाई 2007 के पहले शुक्रवार की बारिश के बाद की ताजगी वाली सुबह में कॉफी वेंडिंग मशीन ने जिंग शी.. ईईई… की आवाज की और मशीन से कॉफी की धारा निकल पड़ी, दीपक सर अपना भरा हुआ मग उठाकर पलटे हीं थे कि सामने से न्यू जॉइनी GET कमल आता हुआ दिखा।

दीपक सर –  गुड मॉर्निंग कमल! कैसा लग रहा है कैरीयर का पहला वीक ऑफिस में?

कमल – अच्छा है सर। पाण्डे सर ने NTPC शक्तिनगर के कॉन्ट्रैक्ट पढ़कर प्रेजेंटेशन बनाने को बोला है।

दीपक सर – तो पढ़ा? समझ में आया?

कमल – सर समझ में तो आ रहा है, लेकिन एक क्लॉज़ पढ़कर दूसरे क्लॉज़ को पढ़ते समय पहला वाला भूल जाता है। मतलब सर… इतने सारे क्लॉज़ कैसे याद रखेंगे?

दीपक सर – कॉफ़ी लेकर मेरे सीट पे आओ।

कमल अभी 4 दिन पहले हीं 2 महीने की बरोडा में ट्रेनिंग के बाद फरीदाबाद ऑफ़िस में जॉइन किया है। दीपक सर पावर प्रोजेक्ट्स की सेल्स/ बिडिंग देखते हैं और कमल के इमीडियेट बॉस हैं। पाण्डे साहब पावर डिपार्टमेंट के HOD हैं। कमल एक मध्यमवर्गीय पारिवारिक पृष्टभूमि के बिहार के बक्सर से है। उसने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई इसी वर्ष NIT इलाहाबाद से पूरी की और L&T Power में उसका कैंपस हुआ। मैं कमल को बहुत नजदीक से जनता हूँ और उसकी डायरी के प्रमुख हिस्से जो उसने मुझसे शेयर किये, आपके समक्ष रखने का प्रयास कर रहा हूँ। उम्मीद है इस प्रयास का यह पहला अध्याय आपको खुद के ट्रेनी इंजीनियर के दिनों की याद दिला देगा और आपको अंदर से गुदगुदाएगा, हंसाएगा, आपके भी संघर्षों के दिनों की याद ताजा होगी। फरीदाबाद में जोइनिंग के पहले दिन दीपक सर किसी टेंडर के लिए मुम्बई चले गए थे और आज हीं वापस आये। पहले दिन कमल जब HOD पांडे सर से मिला तो उन्होंने ये शक्तिनगर प्रोजेक्ट का कॉन्ट्रैक्ट पढ़कर वीकेंड में एक प्रेजेंटेशन देने के लिए कमल को उसका पहला असाइनमेंट दिया।

कॉफी लेकर कमल अपना नोट्स उठाते हुए दीपक सर से मिलने पहुँचा। दीपक सर ने कमल के नोट्स देखे औऱ फिर थोड़े सवाल – जवाब के बाद कमल को देसी-जमीनी भाषा में समझाने लगे… देखो कमल! कॉन्ट्रैक्ट अलाउद्दीन खिलजी से औरंगजेब तक इतिहास – भूगोल की तरह मत पढ़ो। पहले यह जान लो कि कौन से क्लॉज़ कहाँ हैं और उनको प्रायरटाइज करो। जैसे कि प्रोजेक्ट का टाइम शेड्यूल यानि कि समय काल क्या है, कब से शुरू हो रहा है यानि कि जीरो डेट। मध्यावधि मील के पत्थर यानि कि माइलस्टोन क्या हैं। इसके बाद पेमेंट टर्म्स यानि कि हमें पैसा कब मिलेगा, ये नोट डाउन करो। इसमें दो चीजों को रेखांकित मने अंडरलाइन करो, पहला एडवांस कितना है और क्लाइंट रेटेन्सन कितना रोक के रखेगा। दीपक सर आगे बता रहे थे… फिर बात आती है हमारे ऊपर पेनाल्टी के संभावनाओं की। मतलब यदि प्रोजेक्ट डिले होता है तो कितनी पेनाल्टी है। स्कोप में कुछ परफॉर्मेंस पैरामीटर्स होते हैं, उनको अचीव नहीं करने पर क्या पेनाल्टी है। सबसे जरूरी बात सलिएन्ट फीचर को ध्यान में रखो उससे पूरे स्कोप का पता लगता है। अभी तुम इतना हीं ध्यान से पढ़कर अपना प्रेजेंटेशन पाण्डे सर को दिखाओ फिर बात करेंगे।

 

कमल अपनी सीट पर वापस आया, थोड़ा ज्यादा आत्मविश्वास से  भरपूर। कमल ने इन्हीं सुझाये हुए क्लाजेज को पढ़कर दिन भर में एक प्रेजेंटेशन तैयार की और पाण्डे साहब के समक्ष शनिवार को उसकी प्रस्तुति की। पाण्डे सर ने ध्यान से कमल की बात सुनी और उसके क्विक लर्निंग और मेहनत की तारीफ करने लगे तभी दीपक सर ने उनके केबिन में प्रवेश किया। दीपक सर ने बताया – सर कमल बहुत मेहनती बंदा है, कल मैंने इसको कुछ टिप्स दिए थे। औऱ देखिए क्या बढ़िया प्रेजेंटेशन बनाया इसने। पाण्डे साहब ने कमल की ओर नजर करके गुड बोला। फिर दीपक सर से मुखातिब हुए। दोनों सम्भ्रांत सीनियर किसी टेंडर में बिड पे आये हुए टेक्निकल क्वेरी को लेकर बात कर रहे थे और कमल पूरे तल्लीनता से, ध्यान से उनकी बात सुन रहा था। करीब 10 मिनट की बात-चीत खत्म हुई और दीपक सर केबिन से बाहर कार्यवाही के लिए चले गए। अब 49 सावन में अपने सर के बाल पका चुके HOD पाण्डे साहब समझा रहे थे कमल को… देखो बेटे! मैंने तुम्हें पहले हीं दिन कॉन्ट्रैक्ट पढ़ने के लिए इसलिए बोला कि तुम्हारा डाक्यूमेंट्स से डर कैरियर के पहले सप्ताह में हीं निकल जाये। तुमने अच्छा काम किया और दीपक ने भी तुम्हारी मदद की। यही टीम वर्क बना के रखो। एक मूल सिद्धांत बताता हूँ तुम्हें कॉन्ट्रैक्ट के बारे में… कमल ध्यान से सुन रहा था …. कॉन्ट्रैक्ट को जब पढ़ो, जब उसका अध्ययन करो तो विज्ञान की तरह पढ़ो। और जब उसको अप्लाई करना हो बिड के समय, एग्जेक्युसन के समय, क्लोजर के समय तो कॉन्ट्रैक्ट प्रबंधन एक आर्ट बन जाता है। और वह आर्ट अनुभव से आता है। जुलाई माह के प्रथम शनिवार शाम के 7बज चुके थे। पाण्डे साहब ने पूछने के लहजे में कमल को आदेशात्मक स्वर में कहा “शैल वी कॉल इट अ डे” … कमल ने प्रत्युत्तर दिया – स्योर सर… उसने आगे बोला – सर एक रिक्वेस्ट है सर.. अगस्त में रक्षाबंधन में 2दिन की छुट्टी चाहिए। पाण्डे साहब ने रिप्लाई दिया – ट्रेनिंग पीरियड में छुट्टी मिलती  नहीं है, फिर भी देखेंगे।

कमल शुभरात्रि बोलकर केबिन से पूर्ण आत्मविश्वास और संतुष्टि से बाहर निकलकर अपने फ्लैट मेट्स को फोन किया… राहुल! अबे तुम लोग किधर हो? अपन के नौकरी का पहला वीकेंड है। आज रात्रि का भोजन बाहर करते हैं और मूवी चलते हैं यार। राहुल ने बोला – ठीक है हम सभी तो रूम पे आ गए हैं। तैयार होके ऑफिस के सामने मिलते हैं। वहीं से ऑटो लेकर क्राउन प्लाजा मॉल चलेंगे।

कमल ऑफिस के बाहर हीं दोस्तों की प्रतीक्षा करने लगा। तभी वहाँ से उनके रूम मेट राहुल के डिपार्टमेंट में उन्हीं की तरह न्यू ज्योइनी, सलोनी सी नैन-नक्श लिए हुए “ऋचा” भी मेन गेट से निकली। राहुल पिछले 4-5 दिनों में अक्सर ऋचा की खूबसूरती और अदाओं की चर्चा करता रहता था। कमल के दिल में दो- चार घंटियाँ बजी और वो ऋचा की तरफ आकर्षित हुआ। लेकिन बात करने की हिम्मत  नहीं हुई। ऋचा भी कमल को घूरते हुए अपने गंतव्य को निकल गई। इसी  बीच कमल के दोस्त भी पहुँच गए और सभी GET अपने नौकरी के पहले वीकेंड को सेलिब्रेट करने के लिए शेयर्ड विक्रम ऑटो में बैठकर क्राउन प्लाजा की तरफ रवाना हुए। लास्ट शो की टिकट लेकर सारे छुट्टे इंजीनियर मॉल में आनंद के पश्चात डिनर के लिये एक रेस्टूरेंट में बैठे। हैप्पी ऑवर में मॉकटेल के आर्डर के बीच में कमल दो मिनट के लिए रेस्तराँ से बाहर आकर माँ को फोन किया और घर पे पिताजी और सभी की कुशल क्षेम पूछी। … रेस्तराँ में वापस आकर कमल दोस्तों के साथ जवानी के फक्कड़ वाले दिनों में खो गया। डिनर के बाद सबने मूवी देखी। और करीब रात के पौने दस बजे डक-डक करते शेयर्ड ऑटो में अपने रूम के लिए रवाना हुए। रूम पहुंचकर स्नान के बाद कमल जब वाशरूम से बाहर आया तो सभी मित्र सो चुके थे। कमल ने रेडियो मिर्ची ऑन की, सायमा पुरानी जीन्स के साथ हाजिर थी… कमल लेटे हुए रफी साहब की आवाज में अपने उम्र का हृदय स्पर्शी गाना सुनने लगा… छू लेने दो नाजुक होंठो को, कुछ और नहीं हैं जाम हैं ये… और कमल को याद आ रही थी उसकी कॉलेज लाइफ की असफल मुहब्बत जो कि 99 प्रतिशत मेकैनिकल इंजीनियर्स के साथ होता है…. और अचानक ऋचा का सलोनी चेहरा कमल के सामने से गुजरते हुए मर्म स्पर्शी हृदय को छू गया… कमल रफी साहब की आवाज के साथ भूत काल के असफल इश्क को भूलाकर भविष्य के स्वर्णिम सपनों में अपने महबूब को ढूँढ़ते हुए नींद के आगोश में चला गया… (क्रमशः…)

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3 thoughts on “The Diary Of A GET – Part 1

  1. Amazing…………..bahut bahut badhai kirti bhai……….aur subhkaamnaaye series me aage aane wali kahaniyo ke liye……………desperately waiting for next one now.

  2. Very engagaing. Reminded me of the stories on FB page “Bhak Saala” which too had similar funny, nostalgic yet engaging stories…
    Waiting for the next part of the series…
    Great work..

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