Diary of a GET- Part 2


By Kirti Vardhan (NSBU, HCIC, WDFCC –  CTP 3R Project, Mehsana, Gujarat)

[Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। कहानी में उपयोग हुए सभी पात्र, स्थान, L&T प्रबंधन के सभी पात्र – उनके हिरार्की और परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में किसी घटना से संबंध होता है तो इसे महज संयोग हीं माना जायेगा। इस कहानी श्रृंखला का उद्देश्य केवल मनोरंजन है, जिससे लेखक सामान्य तौर पे एक GET के शुरुआती दिनों की याद ताजा कराने की कोशिश मात्र कर रहा है।]

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http://www.enlightenment.ind.in/writers-corner/2017/08/the-diary-of-a-get-part-1/

 

रविवार की संदली सुबह को जब कुकर की सीटी ने कमल को आँख मिजते हुए सुनहले ख्वाब से जगाया तो सामने सहपाठी राहुल कहीं जाने को तैयार था। अमुमन साप्ताहिक दिनों में ऑफिस जाने के समय से दस मिनट पहले जागने वाला राहुल आज रविवार को साढ़े सात बजे रेडी? कमल ने पूछा “का हुआ भाई ! तेरी तबियत तो ठीक है? ” … राहुल ने चाय की प्याली कमल की तरफ बढ़ाई और खुद भी अमूल फुल क्रीम दूध से बनी चाय की चुस्की लेते हुए बोला “यार एक सीनियर हैं, वो राजेन्द्र  नगर में रहकर IES की तैयारी कर रहे हैं.., उन्हीं से मिलने जा रहा हूँ। मेरी भी IES की प्रतियोगी परीक्षा में रुचि है”

कमल को थोड़ा आश्चर्य हुआ, वो अब तक अपने रूममेट राहुल को सभी छः फ्लैटमेट्स में सबसे फेंकी समझता था। कमल ने प्रत्युत्तर दिया “ठीक है जा। कुछ हमारा भी मार्गदर्शन कर दियो भाई! कब तक आएगा?”

राहुल – शाम हो जाएगी, मैंने नाश्ता कर लिया है। मेरा दुपहर का भोजन नहीं बना है। कुक अभी किचन में है। उसके जाते टाइम दरवाजा बंद कर लियो।

राहुल के जाने के बाद, चाय खत्म करके कमल ने सोचा ….संडे को एक नींद और हो जाय। उसने झपकी ली हीं थी कि उसके अंतर्मन ने झकझोरा…… “बेटा चैन से सोना है तो जाग जाओ” …..उठकर देखा तो बुड्ढी कुक रूम में झाड़ू लगा रही थी। वो रूम से बाहर निकलते हुए कमल से आदेशात्मक स्वर में बोली “आटा, सरसों तेल और जीरा ले आना, रात के लिए नहीं है। बाकि सारे सो रहे हैं अभी….. इसलिए तुम्हारी जिम्मेदारी है। कमल ने बिस्तर छोड़ के संडे टाइम्स उठाया…..पेपर को लुड़ेरकर रबर बैंड से बांधा हुआ था, खींचते ही रबर बैंड टूट गया और 2किलो के संडे टाइम्स से कुछ पेज जमीन पर गिर गए, जिसमें ज्यादातर विज्ञापन थे। कमल को मुख्य पृष्ठ ढूँढने में भी काफी बखत लगा, जिसमें पृष्ठ पर आधे से ज्यादा भाग में विज्ञापन भरे हुए थे। कमल ने प्रमुख समाचार के बाद संपादकीय में स्पीकिंग ट्री पढ़ना शुरू किया। जिसका मुख्य संदेश था….

यूँ जमीन पर बैठकर, क्यूँ आसमान देखता है।

पँखों को खोल, जमाना सिर्फ उड़ान देखता है।।

 

10 बजने के करीब बाकी चार रूममेट्स भी उठ गए। एक राउंड और चाय चली….. टाटा गोल्ड, अमूल गोल्ड और अदरख के कतरों ने चाय को गोल्ड से सोना बना दिया।…..रविवार सुबह की बईठउकी शुरू हुई… राहुल कहाँ है?….. प्रश्न पूछा गया… इस सवाल से पांचो फ्लैटमेट्स में गंभीर मंत्रणा होने लगी…… भविष्य की गोल्स / ऑब्जेक्टिव मने लक्ष्य / उद्देश्य / ध्येय पर चर्चा होने लगी……. प्रशांत ने कहा उसको MBA करना है, वो CAT प्रिपरेशन के लिए शीघ्र इवनिंग क्लासेज जॉइन करेगा।… अमित बोला उसे सरकारी या PSU में नौकरी करनी है…… रोहित का मत था कि वो यही नौकरी 4-5 साल सतत करेगा, उसे डिज़ाइन प्रोफाइल में  मजा आ रहा है।…..  इसी चर्चा के बीच कमल ने भी अपनी बात रखी…. “मुझे भी जॉब प्रोफाइल अच्छा लगा। MBA करने की इच्छा मेरी भी है, लेकिन मैं अभी जॉब कंटिन्यू करूँगा” ..कमल ने दोस्तों को बताया मेरे सीनियर दीपक सर बोल रहे थे, अपनी कंपनी भी स्पोंसर्ड MBA करवाती है। कईं सारे इंस्टिट्यूट से टाई अप है। …. मंत्रणा के बीच में नाश्ता निपटा के कमल ने सभी को मॉल चलकर राशन लाने का प्रपोजल दिया…. जो कि सर्वसम्मति से स्वीकार हुआ। कमल ने सभी को बताया कि वो रक्षा बंधन में घर जा रहा है। सारे तैयार हो के मॉल निकलते हैं…..

सोमवार की सुबह ऑफिस में पांडे सर ने कमल को बुलाया और बताने-पूछने लगे…

हम अगर मंज़िलें न बन पाए,

मंज़िलों तक का रास्ता हो जाएँ।

 

शायर फ़राज़ के ऐसे हीं मिलते -जुलते लफ्जों में HOD पांडे साब, प्रभात के सूरज सदृश, समझा रहे थे कमल को …”कमल अब करीब डेढ़ महीने हो गये तुम्हें जॉइन किये हुए, अब दीपक की सहायता से इतर स्वंतंत्र रूप से काम पकड़ना शुरू करो। इस टेंडर की कॉस्टिंग (Costing) के लिए जरूरत के करीब सारे डिटेल्स तुम्हारे पास हैं। कमल के चेहरे से बहुत स्वीकृति मिलती नहीं दिखी पांडे सर को…. उन्होंने कहा “तुम शुरू तो करो, मैं और दीपक तुम्हारे वर्किंग की समीक्षा कर लेंगे” कमल थोड़ा हिचकते हुए हाँ बोलकर टेंडर की प्लानिंग में लग गया…… दिन भर के परिश्रम के बाद उसको कुछ आत्मविश्वास जरूर आया। वो शाम को कॉफी मशीन के पास लपका, वहाँ उसे ऋचा भी मिली। कमल ने पहली बार हिम्मत करके ऋचा को हैल्लो बोला…. प्रत्युत्तर में मोरनी सी सुरीली आवाज में हैल्लो सुनने को मिला……, साथ में… हॄदय के अंतिम छोर को आनंदित कर देने वाली ऋचा की स्माइल….

कमल अपने सीट पे कॉफी की अंतिम घूँट लेकर वापस कुछ कॉस्टिंग कैलकुलेशन की सोच हीं रहा था, तभी प्रशांत आकर पूछा “भाई आज हीं सारे टेंडर ले आएगा के? चल सभी वॉलीबॉल खेलने जा रहे हैं… ऑफिस कैंपस के पीछे वाले ग्राउंड में?…. कमल ने समय देखा शाम के साढ़े छः बजे थे, उसने सिस्टम ऑफ किया और वॉलीबॉल के लिए निकल लिया”….

टार्गेटेड दिनों में अपना काम खत्म करके कमल ने पांडे सर को एक्सेल फ़ाइल और वर्किंग डिटेल्स सेंड करके रिव्यु मने समीक्षा के लिए उनके केबिन में गया। करीब एक घंटे की मीटिंग में पांडे सर ने कुछ करेक्शन का सुझाव दिया।..  कमल ने कल शाम को घर निकलने की सूचना देकर दो दिन की छुट्टी की विनती की, पांडे सर ने हैप्पी जर्नी की शुभेच्छा दी और कहा “जाने से पहले कररेक्टेड फाइल्स चेंज करके भेज देना”

14अगस्त 2007 को फरीदाबाद से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन जाना किसी युद्ध जीतने से कम नहीं था। यद्यपि कमल की ट्रेन मगध एक्सप्रेस शाम 8बजे थी, वो ट्रैफिक और स्वतंत्रता दिवस सुरक्षा नियमों को ध्यान में रखकर ऑफिस से सभी को कुशल क्षेम बोलकर 4बजे हीं निकल गया……अपने पैरों पे खड़े होकर, नौकरी जॉइन करके पहली बार घर जाने के आनंद से कमल को एक नए आत्मबल की अनुभूति हो रही थी। उसको नई दिल्ली से ट्रेन खुलने के बाद लग रहा था, जैसे वो कोई राजकुमार की तरह विजय पताका फहराकर अपने सल्तनत को लौट रहा हो। ट्रेन में सोने से पहले माँ को फोन किया कमल ने “मैं ट्रेन में सकुशल हूँ, कल सवेरे करीब 10 बजे तक घर आऊंगा। मस्त खाना बना के रखना”

करीब बारह बजे कमल रेलवे स्टेशन से ऑटो में घर पहुँचा। बिहार के बक्सर जिले में मुख्य शहर से थोड़ी हीं दूरी पर एक व्यवस्थित कॉलोनी में कोई 1600 स्क्वायर फ़ीट में बना हुआ कमल का डेढ़ मंजिला मकान….. लोहे के चैनल और सीट से बने हुए मुख्य द्वार, जिससे कि आरपार देख सकते हैं। कमल ने ऑटो वाले को पैसे देकर… गेट से अपने घर के प्रांगण में प्रवेश किया….. अंदर पिताजी की कोई 22बरस पूरानी बजाज स्कूटर आज भी शान से कमल को नमस्कार कर रही थी। चहारदीवारी में चारों तरफ बारिश के मौसम की वजह से हरियाली थी। कुछ गमले भी पड़े थे, जिनमें सभी में फूल पत्ती लगे हुए थे, उनमें से कुछ गमले आधे झर गए थे। लेकिन कसी हुई मिट्टी में पौधे फल फूल रहे थे…… सबसे बड़ा गमला घने तुलसी के पेड़ का है , जो चहारदीवारी के उत्तर-पूर्व कोने में लगा है। 15 सेकेण्ड में कमल को अपना पूरा बचपन और किशरोवस्था याद आ गया। वो आगे बढ़कर पक्का चढ़के जहाँ एक छोटा टेबल और 2-4 कुर्सियां पड़ी थीं, उनके बगल से आगे निकलकर घर का दरवाजा खटखटाया। टेबल और कुर्सियां बहुत पुरानी थीं, लेकिन धूल-गंदगी का एक भी निशान न था। खटखटाने पर माँ ने दरवाजा खोला, एक क्षण के लिए कमल को लगा सब-कुछ रुक गया है…., सब स्थिर हो गया है….। उसने झुककर माँ का चरण-स्पर्श किया, उठा तो माँ की आँखें सजल दिखाई दीं। ऐसे ममत्व और अपनेपन से भरे हुए क्षण को शायद कमल ने पहले कभी महसूस नहीं किया था…..माँ ने झट से कमल को गले लगाया और उसके हाँथ से बैग लेकर अंदर बुलाया। सामने पिताजी खड़े मिले, शायद अभी नहाकर निकले थे। पुत्र को देखकर उनका ललाट स्वाभिमान से चमक उठा था…. पिता- पुत्र में आँखों मे हीं बातें हुई….., सिवाय एक सवाल के जिसका उत्तर पिताजी को मालूम था “ट्रेन लेट हो गयी क्या?”….. माँ ने सोनपापड़ी प्लेट में रखकर एक तांबे के गिलास में पानी देते हुए कमल से पूछा “चाय पियेगा या नहा के आ, गर्म गर्म खाना लगाती हूँ”…. खाना और आराम के बाद कमल ने माँ के हाँथ में अपनी पहली कमाई के पांच हजार रुपये देकर कहा.. “माँ इन पैसों से आप वो चीज खरीदो जो कि “आपके शौक” की हो। पूरी उम्र तो आपने हम भाई बहिन और पिताजी को सुख-सुविधा देने में निकाल दी” …. इस कथन से पीछे सोफे पे बैठे पिताजी की आँखें डबडबा गयीं। ……कमल ने टॉपिक चेंज किया और बोला मुझे दीदी के लिए एक बनारसी साड़ी लेनी है, मैं उसे परसों राखी पे दूंगा। उसने माँ से कहा, “माँ आप भी चलो परसों, नानाजी का गांव दीदी के ससुराल के पास हीं है……, आपको छोड़ता हुआ दीदी के यहाँ चला जाऊंगा। शाम तक वापस आ जाएंगे। …..कमल माँ के साथ “हमारा बजाज” पे शान से खरीददारी करने निकल गया।….

बक्सर और गाजीपुर की सरहद पर बस हुआ रामपुर गाँव मूलतः यूपी के गाजीपुर का हीं हिस्सा है। बक्सर से कोई 45 किलोमीटर पक्के हाईवे के बाद अब कमल ने अपने बजाज स्कूटर को कच्चे चकरोड पर उतार दिया। पीछे बैठी माँ को खराब रास्ते से थोड़ी तकलीफ जरूर हो रही थी, लेकिन अपने मायके जाने की खुशी के सामने वो तकलीफ नगण्य थी। रास्ते में चकरोड के दोनों तरफ खेतों में या तो रोपाई हो गई थी या चल रही है। कुछ मक्के की खेती की कटाई भी चल रही है। मोर की आवाज सुगम संगीत की तरह गूंजायमान होकर कानों में शहद घोल रहीं हैं, उस पर गौरया और अन्य चिड़ियों की चहचहाहट उस संगीत को तान देती प्रतीत हो रही हैं। …….स्कूटर नानाजी के द्वार पे पहुंची, कमल ने बायीं हाँथ से स्कूटर का गियर न्यूट्रल किया। पेशेवर किसान नानाजी रिटायर्ड यानि के सेवा निवृत्त हिंदी के अध्यापक रह चुके हैं।  उनके दरवाजे पर खाट की लाइन लगी है। ट्रैक्टर, ट्रेलर, हल, बोरसी, तगाड़ी, खोइचा इत्यादि अस्त व्यस्त….जिसको जहाँ जगह मिला… पड़े हैं। 3-4 गायें खाने के बाद नाद के सामने हीं बैठकर चुगाली कर रही हैं। वर्षों से घर की रखवाली कर रहा एक मजूर गायों के शाम के खाने के लिए हरा चारा काट लाया है, और उसको भूँसे के ढ़ेर के पास हीं पटक दिया है।

स्कूटर का स्टैंड लगाते लगाते कमल ने सोचा …. “बॉस! जो आनंद और अनुभूति गाँव में है, वो और कहीं नहीं…… किसी दिल्ली और किसी नौकरी….. और किसी सफलता में नहीं। ….नानाजी ने उठकर अपनी बेटी और नाती को गले लगाया। कमल को एक गइया की तरफ इशारा करके बोला, आज हीं बछिया हुई है, नए दूध का इन्नर खा के राखी बंधवाने जाना। कमल खाट पे हीं बैठे माँ को मामी आदि महिलाओं के साथ घर के दालान में प्रवेश करते देखने लगा। इसी बीच पांडे सर का फोन आया… “कमल ! आपको छुट्टी में डिस्टर्ब कर रहा हूँ…. कैसे हैं आप? उम्मीद है घर में सब कुशल-मंगल है…..एक जानकारी दीजिये….. आपने मैकेनिकल BOP की कॉस्टिंग के लिए कौन से सप्लायर का कोटेसन कंसीडर किया है? अगले छः महीने का कॉस्ट कमिटमेंट लेटर दिया है उसने?……कमल ने पूरी जानकारी दी।” …. दूध का इन्नर खा के कमल झटपट दीदी के गांव को निकला……. दरवाजे पर हीं जीजाजी और उनके पिताजी ने स्वागत किया और घर के अंदर ले गए। कोई एक बरस पहले हीं दीदी की शादी हुई थी, उसके बाद अब कमल की भेंट हो रही थी दीदी से। आरती, टिका और राखी बांधने के बाद मिठाईयां सजी हुई थीं कमल के लिए। कमल ने उपहार बनारसी साड़ी दीदी को भेंट किया….., कुशल क्षेम पूछा।… दीदी भी कमल की अच्छी नौकरी लग जाने से खुश नजर आ रही थीं। दोपहर का भोजन कमल ने घर के बाकी पुरुषजनों के साथ में किया। दीदी के रिश्ते के फूफाजी पूछने लगे कमल से “आपने मकेनिकल इंजीनियर की पढ़ाई की है, अब क्या करते हैं?” कमल ने बताया मैं L&T करके एक प्राइवेट कंपनी है,.. उसी में कार्यरत हूँ। फूफाजी ने प्रत्युत्तर में पूछा “अरे हाँ …वही एन एल टी (उन्होंने अपने हिसाब से उच्चारण किया) जो स्विच, मोटर स्टार्टर वगैरह बनाती है? … फिर कमल से पूछा “आप क्या करते हैं उसमें?

कमल – जी मैं टेंडरिंग में हूँ।

फूफाजी – वो क्या होता है, इंजीनियर बनके भी वही टेंडरिंग हीं करना है। येही काम तो अपना ये पड़ोस में सुरेश है, वो भी करता है…., दर्जा दस पास है। रोज टेंडर डालके pwd का कोई न कोई ठेका ले हीं लेता है। फिर तुम का कर रहे हो?

कमल अपने जीजाजी की तरफ देखकर मुस्कुराया और उन्होंने भी इस वाद-प्रतिवाद में मौन रहने की हीं स्वीकृति दी।…. साढ़े चार के करीब दीदी को प्रणाम कर कमल नानाजी के घर की तरफ निकल गया। नानाजी , माँ और बाकी घर के सदस्य बाहर हीं दालान में बैठे थे। नानाजी ने कमल को पास बुलाया और नौकरी, स्वास्थ्य इत्यादि के बारे में पूछने लगे। उन्होंने आगे के लक्ष्य/ गोल के बारे में पूछा। कमल को अपने दोस्तों के साथ की हुई मंत्रणा याद आ गयी…., उसने नानाजी से कहा MBA करूँगा, लेकिन कुछ बरस नौकरी के बाद।

नानाजी ने कुछ उत्साहवर्धक शब्दों से कमल का प्रोत्साहन किया और बोले…..

वह पथ क्या, पथिक परीक्षा क्या, जिस पथ में बिखरे शूल न हों।

नाविक की धैर्य कुशलता क्या, जब धाराएं प्रतिकूल न हों।

नानाजी आगे बता रहे थे, बेटे! कभी भी तठस्थ मत बनना…… “चरैवेति, चरैवेति”…., यही संदेश विवेकानन्द जी ने भी दिया। जो भी करो…., दिल से करो और प्राइवेट नौकरी में “निर्णय” अपने टेबल पे कभी भी पेंडिंग मत रहने दो….. साढ़े पाँच होने को थे, कमल ने सभी को प्रणाम कर स्कूटर घुमाया और माँ के साथ घर के लिए चल पड़ा। रात के खाने के लिए लिट्टी/ मकुनी, ठकुआ और चोखा नानाजी ने बनवा के दे दिए थे। कल शाम की ट्रेन से कमल को वापस अपने कर्मक्षेत्र L&T, फरीदाबाद भी लौटना था। ……घर पहुँच के फ्रेश होकर चाय के बाद कमल ने दबा के लिट्टी चोखा खाया। खाने के दौरान हीं माँ ने पूछने के लहजे में बताया…., बेटे! तुम्हारी शादी के लिए बहुत से फोटोग्राफ और बॉयोडाटा आये हैं… कल जाने से पहले एक बार देख लो। दीवाली में आओ तो सामने से लड़की से मिल लेना, जो भी पसंद हो।….. कमल ने पिताजी की तरफ देखकर, मुँह बनाकर अनसुना कर दिया। हालांकि कमल को पापा के फेसिअल एक्सप्रेसन् से लगा कि पापा उससे किसी पॉजिटिव रिस्पांस की प्रतीक्षा में हैं।…. थका हुआ कमल भोजन के पश्चात अपने रूम में पुराने cd प्लेयर को ऑन किया…. नींद की आगोश में जाने से पहले लता जी की आवाज में उसे ऋचा दिखाई दी……

बसने लगे आँखों में कुछ ऐसे सपने,

कोई…. बुलाये जैसे…, नैनों से अपने…., नैनों से अपने….

(क्रमशः)

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