Diary of a GET- Part 4


By Kirti Vardhan (NSBU, HCIC, WDFCC –  CTP 3R Project, Mehsana, Gujarat)

[Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। कहानी में उपयोग हुए सभी पात्र, स्थान, L&T प्रबंधन के सभी पात्र – उनके हिरार्की और परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में किसी घटना से संबंध होता है तो इसे महज संयोग हीं माना जायेगा। इस कहानी श्रृंखला का उद्देश्य केवल मनोरंजन है, जिससे लेखक सामान्य तौर पे एक GET के शुरुआती दिनों की याद ताजा कराने की कोशिश मात्र कर रहा है।]


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सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।

जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

#रामचरितमानस

एनुअल डे की अगली सुबह का सूरज एकदम हीं नया लगा कमल को। बरबस हीं उसको ख्याल आया…

“ओस की बूंदों सी दमक

सूरज की किरणों सी चमक

आज फिर से सजा मैं मोतियों की तरह,

प्रकृति से शक्ति लेता…. “

जब युवा शक्ति अपने आगाज-ए-मुहब्बत को अमली जामा पहनाने में सफल होती है तो सामान्यतः उसका अंजाम-ए-कैरियर बहुत ऊंचाइयों को छूने लगता है। कमल बहुत दिनों बाद पूरे ध्यान से अपने ऑफिस और काम में पूर्ण मनोयोगपूर्वक से समर्पित होने लगा।

कॉरपोरेट जीवन के करीब आठ माह बाद अब HOD पांडे जी भी कमल में एक परिपक्व बिज़नेस डेवलोपमेन्ट इंजीनियर देखने लगे थे। यद्यपि अभी कमल को बहुत कुछ सीखना था, कॉस्टिंग की थेओरेटिकल मूल्यांकन टेंडर के समय और वही प्रोजेक्ट एक्सीक्यूट होने के बाद कॉस्टिंग में कितना फर्क आता है। यह जिसने सीख लिया, कॉन्ट्रैक्ट्स के दाँव पेंच – फेवरेबल क्लाजेज को कैसे अपने पक्ष में प्रयोग करना है। अनफेवरेबल क्लाजेज कैसे चुप चाप ठंढे बस्ते में पड़े रहें, यह भी सीखना, जानना और प्रयोग करना है। कमल को पांडे जी हमेशा सीखाते रहते थे। कई बार पांडे साब, कमल को कुछ व्यक्तिगत मसलों पर भी सलाह देते थे। पांडे जी की दिनचर्या बड़ी हीं अनुशाषित थी। विशेषकर उनका खान पान, सोने जागने का समय, नियमित योग इत्यादि। अब कमल से वे इस विषयों पर भी चर्चा करते थे। पांडे साब अक्सर कहते हैं…

“To have what few have, do what few do.”

पांडे जी बताते हैं, कमल!…. टेक्निकल ज्ञान का अपना महत्व है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है अपनी टीम की काबिलियत का 100% आपके साथ होना, आपके ऑब्जेक्टिव/ लक्ष्य के साथ होना, प्रोजेक्ट के साथ होना।   ये जो लोग हैं ना, तुम्हारे आस पास के यही तुम्हारी ताकत हैं। टीम में बहुत लोग नहीं चाहिए, बहुत लोगों की एक हीं टीम चाहिए। और उस टीम की साइकोलॉजी ऐसी होनी चाहिए –

संसार में सुई बनकर रहें, कैंची बनकर नहीं,

सुई दो को एक कर देती है, और कैंची एक को दो कर देती है,

सबको जोड़ें, तोड़े नहीं।

कई बार कठिन काम या टफ क्लाइंट विजिट पे कमल को भेजते समय पांडे जी कहते थे….

“The harder the situation, the more growth there is available to you IF you look for it.”

पांडे जी कमल से पूछते भी रहते हैं उसके अपने व्यक्तिगत लक्ष्य के बारे में… वह कहते हैं… यदि तुम्हारे अपने व्यक्तिगत लक्ष्य ऑर्गनाइजेशनल लक्ष्य से समानता रखते हैं तो तुम समझो कि तुम सही जा रहे हो। और यह तुम्हें किसी किताब में नहीं मिलेगा, ये अध्ययन- मूल्यांकन तुम्हें खुद करना है। इस तथ्य को उचितानुचित करने के लिए पांडे जी बताते हैं…

‘अगर जिंदगी में कुछ पाना हो तो, तरीके बदलो, इरादे नहीं”…

इन्हीं शिक्षाओं, अनुभवों और अपने प्यार- परिवार के सहारे कमल परिपक्वता की आगे की सीढ़ियों के लिए तैयारी करते जा रहा है।

कमल की शाम,.. वही दिल्ली की ठंढ़ वाली…, अब दोस्तों के  साथ कुछ कम गुजरती है। और ऋचा के साथ फोन पर ज्यादा। अनंत बातें, अनगिनत तथ्य, अलौकिक प्रेम और असंख्य सपने… यही तो अब कमल-ऋचा प्रेमी युगल की धन-संपदा बनती जा रही थी। देर शाम से शुरू होती बातें कई बार साप्ताहिक दिनों में भी भोर के सूरज के साथ हीं खत्म होती थीं। लेकिन दोनों ने ऑफिस और दोस्तों को अपने प्रेम से अलग रखा था। वो कहते हैं … “प्रेम परदे में और प्यारा होता है”…

दोनों के अच्छे दिन बढ़िया तरीके से चल रहे थे।

लेकिन अब समस्या थी कि दोनों परिवारों को अपने प्यार के बारे में कैसे सूचित करें, शादी के लिए कैसे सहमति बनावें… कई बार यही सोचकर दोनों दुःखी भी हो जाते थे। लेकिन दोनों को विश्वास था कि कुछ तो तरीका निकाल हीं लेंगे।

कमल अभी भी रोज सवेरे माँ से, और रोज शाम को पिताजी से बात करना कभी भी नहीं भूला। प्यार, परवाह, शरारत और थोड़ा समय, यही वो दौलत है,जो अक्सर आपके अपने आप से चाहते हैं।

जनवरी प्रथम सप्ताह में बुद्धवार की ठंढ़ी सुबह को ऑफिस आते बखत कमल का मन कुछ हल्का लगा। अभी थोड़ी देर पहले हीं उसने माँ से घर पे बात की थी, ऋचा से भी मेसेजिंग हुआ है सुबह उठने के बाद हीं। साथ मे चलते राहुल से कमल ने बोला “यार थोड़ा ललाट छू के देख शरीर गर्म तो नहीं है, बुखार तो नहीं है। राहुल ने बोला बिल्कुल ठीक है मित्र!, रात को फोन पे ज्यादा देर तक लगा था क्या?एक चाय ऑफिस में सब ठीक लगेगा। कमल ने बताया… “नहीं, कल रात टी मैं समय से सी गया। आज सुबह से मन नहीं लग रहा”।…

दोनों ऑफिस पहुँचते है, कमल एक कप कॉफ़ी ले के अपने डेस्क पे बैठा हीं था कि माँ का फोन बजा… “फ़ोन उठाते हीं, माँ हाल चाल पूछने लगीं। लेकिन आवाज से साफ था कि वो घबराहट छुपाने का अभिनय कर रहीं हैं। कमल ने जोर देकर पूछा “माँ ! क्या बात है, इस बखत तो आप कभी फोन नहीं करतीं। क्या बात है” …. सामने से टूटी फूटी आवाज में ” बेटे! पापा की तबियत रात से हीं ठीक नहीं है, अभी कुछ देर पहले 2-3 मिनट के लिए बेहोश हो गए थे। बगल वाले गुप्ता अंकल के साथ उनको हॉस्पिटल ले के आई हूँ। तुम्हारी दीदी और जीजा जी भी थोड़े देर में आ रहे हैं। पापा अभी ठीक हैं। लेकिन बेटा! मेरा मन नहीं लग रहा। तुम….. “कमल ने बात काटी, बोला…. माँ! मैं आ रहा हूँ।”

पांडे सर को ऑफिस और घर की यथास्थिति की जानकारी देकर कमल ने उनसे अविलम्ब घर निकलने की आज्ञा ली।

राहुल और बाकी दोस्तों को संक्षेप में पिता जी की अकस्मात बीमार होने की बात कमल ने बताई। ऋचा से बात नहीं हो पाई, वो अपने काम में व्यस्त है। हालांकि राहुल की सीट पर कमल सहित सारे दोस्तों का जमावड़ा और फ्लाइट बुकिंग वेब साइट्स ऋचा देख पा रही थी। 3घंटे बाद की वाराणसी की एक फ्लाइट कमल को मिली, वहाँ से बक्सर फिर कम से कम 3 घंटे।

कमल तुरंत सबकी शुभेच्छा लेकर ऑफिस से घर के लिए निकला। एयरपोर्ट तक रास्ते में उसने ऋचा को फ़ोन करके सारी बात बताई।

कमल घर पे फोन करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। हालांकि फ्लाइट टेकऑफ के पहले उसने माँ को फोन करके जानकारी ली। टेकऑफ के बाद उड़ान का समय काटना मुश्किल हो रहा था। वाराणसी में लैंडिंग के बाद कमल ने दीदी को फोन किया तो मालूम हुआ की पिता जी के स्वास्थ्य स्थिति और सीरियस होने की वजह से उन्हें बक्सर के डॉक्टर्स ने BHU रेफेर किया है। कमल करीब एक घंटे में वाराणसी एयरपोर्ट से BHU मुख्य द्वार पे पहुँच चुका था। जीजा जी उसे हॉस्पिटल वार्ड तक ले गए। वहाँ माँ, दीदी और बाकी रिश्ते, घर के दोस्त मौजूद थे। अब कमल को पता चला कि पिताजी को माइनर हार्ट अटैक था आज सुबह। समय से अस्पताल ले आने से अभी चीजें नियंत्रण में हैं। कुछ देर पहले होश में हैं पिताजी, लेकिन आज ICU में हीं रहेंगे। कमल अपनी माँ और दीदी का चेहरा देख रहा था। उन दोनों की उदासी से कमल अंदर से बेचैन हो उठा। उसने अपने परिवार में इसस तरह की परिस्थिति की कभी कल्पना हीं नहीं की थी। ये क्षण ऐसे होते हैं, जब आपकी पूरी विद्या, अनुभव, पहचान- पहुँच, प्रेम पराकाष्ठा सब धरे के धरे रह जाते हैं। और ऋषिकेश मुखर्जी के आनंद का यही डायलॉग याद आता है… “बाबू मोशाय! हम सब इस रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं…”

कमल का ध्यान तोड़ा उनके जीजा जी ने….” रात के दस बज गए हैं, थोड़ा खाना खा के सो लो कमल!… पिता जी अब ठीक हैं, सुबह मिल सकते हो तुम उनसे”

खाने का मन तो नहीं था, लेकिन एक रोटी जबरदस्ती ले लिया कमल ने। तभी पांडे जी ने फोन करके कमल से हाल समाचार लिया। इसके बाद कमल ने ऋचा को टेक्स्ट किया और थोड़े देर में हीं वेटिंग एरिया में चादर पे उसे नींद आ गयी। अगली सुबह डॉक्टर्स ने धमनियों में ब्लॉकेज की बात बताई और स्टेन्ट डालने के लिए प्रेस्क्राइब किया। आज हीं के दिन ऑपेरशन हो गया। और 3-4 दिन के बाद डॉक्टर्स ने बहुत सारी सावधानी बरतने की बात बोलकर काल डिस्चार्ज के लिए प्लान किया। कमल ने माँ और दीदी को घर जाने को कहा और बोला कल हम पिताजी को डिस्चार्ज कराके ले आवेंगे। उस रात कमल पिछले एक हफ्ते के बारे में सोचने लगा…

“वो सुबह कभी तो आयेगी

इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा

जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा”

आज पापा घर आ गए। ये एक हफ्ते ने कमल को बहुत गंभीर और प्रौढ़ बना दिया। कमल पिताजी की सेवा में लग गया माँ के साथ। धीरे धीरे पिताजी का स्वास्थ्य बेहतर होने लगा। एक हफ्ते बाद एक बार फिर BHU में पिताजी को फॉलोअप में दिखाकर कमल ने ऑफिस वापसी की तैयारी कर ली। छुट्टी काफी लंबी हो गयी थी, पिताजी का स्वास्थ्य भी अब ठीक है, इसलिए शीघ्र ऑफीस जॉइन करना उसने उचित समझा।

वह ऋचा के बारे में माँ पिताजी से बात करना चाहता था। लेकिन यह समय उचित भी नहीं था और कमल भी अभी माँ पिताजी को छोड़कर कुछ और सोच नहीं पा रहा था।

दवाई इत्यादि, पिताजी के जरूरत की सारी चीजें और माँ – घर की सभी वस्तुएँ घर में रखने के बाद कमल आज बक्सर से दिल्ली के लिए निकल गया। दीदी कुछ दिनों के लिए घर आ गयी थीं। वो और जीजा जी कमल को रेलवे स्टेशन छोड़ने आये। कमल ने हिम्मत करके दीदी से ऋचा के बारे में सभी बात बताई। दीदी बे ध्यान से सुना और कमल को बताया “अभी माँ पिताजी से इस विषय में कुछ भी बात मत करो। यदि तुमको ऋचा सही जीवनसाथी लगती है तो कुछ समय दो, मैं माँ से बात करूँगी। अभी ऑफिस जॉइन करो और अपने काम पे ध्यान दो”।

ट्रेन खुलने वाली थी। कमल ने दीदी के चरण स्पर्श किये और बर्थ पे आ गया। वह जीवन के बारे में विचरण करने लगा …  कमल सोच रहा था… स्नेह और आदर हमें ज़िंदा रखता है ; हमें इज़्ज़त देता है ; बलशाली होता है ; जब तक चाहने वाले साथ हैं , साँस लेने का मन करता है। और इन्हीं में कैसे एक लीडर… एक नेतृत्व अपने माँ पिता, अपनी प्रेमिका- जीवन संगिनी, अपने दोस्तों , अपनी प्रोफेशनल मने व्यवसायिक लाइफ और कम्युनिटी- देश सेवा.. इन सभी के बीच सामंजस्य बिठाकर आगे बढ़ता है।

….कमल खुद को कहने लगा “वेलकम कमल टू रियल वर्ल्ड, टू रियल वर्क-लाइफ-होम-लव बैलेंस…. GET डेज आर ओवर नाउ”…. लेकिन तभी अपने नानाजी की कही बात याद आने लगी, वो उदघोष… स्वामी विवेकानंद का संदेश ..   चरैवेति….. चरैवेति…..

और अटल जी की वो पंक्तियां….

हार नहीं मानूँगा

राढ़ नहीं ठानूँगा

काल के कपाल पर लिखता हूँ, मिटाता हूँ

मैं गीत नया गाता हूँ….

 

(क्रमशः)

3 thoughts on “Diary of a GET- Part 4

  1. Kirti bhai…..you scared me this time…………..before this was like a fairy tale……….but this crash landing to reality is not only emotional but also transformational (GET to रियल वर्क-लाइफ-होम-लव बैलेंस).

    And the best part was : “To have what few have, do what few do.”

    Thanks…waiting for the next part with रियल वर्क-लाइफ-होम-लव बैलेंस which practically means BOSS-WIFE-BANK BALANCE. 🙂

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