परवाना


By Rajesh Dhiman, LMB

मेरी फितरत है कि गुस्ताखी बार बार करता हूँ |

हसर मालूम है लेकिन मोहब्बत बेशुमार करता हूँ |

 

तू आदत बदले तो मैं मिज़ाज़ क्यों बदलूँ,

तू (साड़ी चल)1 कहाँ सड़ने से इंकार करता हूँ |

 

तेरा फूक देना मेरा फुक जाना इत्तफाक नहीं,

मेरे इश्क़ का सलीका है, जो इज़हार करता हूँ |

 

तेरे बिना जीना क्या जीना और मुझे क्या करना,

दो पल तेरे साथ जियूं जान निसार करता हूँ |

 

तेरे सीने लग जल जाने का है मजा बड़ा,

बस मैं जानू या रब जाने कैसे प्यार करता हूँ |

 

मेरा इश्क़ कैद नहीं हो सकता इन हदों मैं,

मैं आरधीमान राज सोचूँ, बस पार करता हूँ |

(साड़ी चल)1– जलाना

4 thoughts on “परवाना

Leave a Reply

Your email address will not be published.