Diary of a GET- Part 5


By Kirti Vardhan (NSBU, HCIC, WDFCC –  CTP 3R Project, Mehsana, Gujarat)

[Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। कहानी में उपयोग हुए सभी पात्र, स्थान, L&T प्रबंधन के सभी पात्र – उनके हिरार्की और परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में किसी घटना से संबंध होता है तो इसे महज संयोग हीं माना जायेगा। इस कहानी श्रृंखला का उद्देश्य केवल मनोरंजन है, जिससे लेखक सामान्य तौर पे एक GET के शुरुआती दिनों की याद ताजा कराने की कोशिश मात्र कर रहा है।]


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Diary of a GET- Part 4


घर से फरीदाबाद वापस ऑफिस जॉइन करने के बाद कमल के पास काफी काम प्रतीक्षारत थे। बहुत सारे टेंडर एक साथ आ गए। सभी के सबमिशन भी कम अंतराल में हैं। इसके लिए पूरी बिडिंग टीम ओवर टाइम के बाद भी व्यस्त रहती है। पांडे साब खुद भी रात 9बजे के पहले ऑफिस से नहीं निकलते हैं।

कमल भी पूरे मनोयोग से हर एक टेंडर में लगा है। इस कारणवश, वह ऋचा से भी कम हीं बात कर पाता है। इस शनिवार भी वह ऑफिस से देर रात गया और रविवार भी पूरे दिन टेंडरिंग टीम ऑफिस में हीं थी। ….  लेकिन कमल का दिल नहीं लग रहा है। उसे घर की याद बहुत सताती है। वह ऑफिस में काम करते- करते अचानक विचलित हो उठता था, और खयाल में डूब जाता “मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ, अभी तो मुझे घर पे पिताजी की सेवा में होना चाहिए”

कमल को हमेशा माँ से लगाव ज्यादा था, ऐसा उसे लगता था। वह माँ के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित भी रहा करता। लेकिन, पिताजी भी बीमार होंगे, ऐसी उसने कल्पना कभी नहीं की थी। खैर … अब फरवरी मध्य में ठंढ़ कम होने लगी है। बसंत दस्तक दे गया है… होली समीप है। और कमल का विचलित मन घर के बारे में यही सोचता…

 

महुओं ने घेर लिया होगा, आँगन !

खेतों में तैरने लगे होंगे दृश्य

गेहूँ के घर ही होगा अब भविष्य

अँगड़ाता होगा खलिहान में सृजन !

आओ घर लौट चलें, ओ मन !

ऋचा उसका व्यस्त होना समझती है, और काम में ध्यान लगाने के लिए प्रोत्साहित भी करती है। लेकिन कमल बहुत सारी बाते ऋचा से करना चाहता था, टेंडरिंग की व्यस्तता उसे बखत मुहैया होने देती… वह मन हीं मन सोचता…

मैं पिछली रात क्या जाने कहाँ था

दुआओं का भी लहजा बे-जबाँ था

हवा गुम-सुम थी सूना आशियाँ था

परिंदा रात भर जाने कहाँ था !!

वक़्त मजबूर कर देता है अपनी देहलीज़ छोड़ने को

वरना कोन अपनी गलियों में जीना नहीं चाहता….

कमल की एक और परेशानी थी…. फाइनेंसियल मुद्दे।

पिताजी की बीमारी के समय काफी पैसे खर्च हो गए थे। कंपनी के मेडिकल इन्सुरेंस से सहायता तो बहुत मिली। लेकिन हॉस्पिटल भर्ती के बखत अन्य खर्च, आना- जाना, यात्रा टिकट और फिर पिताजी के घर आने के बाद अभी भी दवा, फल इत्यादि के लिए पैसों की काफी जरूरत थी। कुछ म्यूच्यूअल फंड्स में कमल ने सेविंग्स कर रखी थी, जो इस बखत काफी उपयोगी थीं, लेकिन पर्याप्त नहीं थीं। कमल ने विचार किया कि मित्रों से उधार लिया जाय, लेकिन उसे ठीक नहीं लगा। सबकी अपनी समस्याएं होंगी और फिर वह समय पर नहीं लौटा पाया तो? उसने दोस्तों से उधार का विचार त्याग दिया।

फिर एक बारगी, कमल ने ऋचा से पैसे लेने की सोची… यह विचार भी उसे ठीक नहीं लगा।

कमल आज शाम को थोड़ा जल्दी ऑफिस से घर को निकल गया। मनन करते हुए कि फाइनेंसियल, पैसा लेन-देन एक ऐसा मामला है, जो विकट परिस्थिति में हम अपने बहुत घनिष्ट से भी माँगने में, बात करने में डरते हैं। कमल ऑफिस मुख्य द्वार से निकला हीं था कि राहुल उसे बाहर खोखे पे दिखा..  राहुल से भी ये मुद्दे में बात करने की हिम्मत नहीं हुई..  वह सोचता हुआ रूम को जा रहा था.

इस भरे शहर में कोई ऐसा नहीं

जो मुझे राह चलते को पहचान ले

अंततः, कमल के पास एक हीं विकल्प सूझा…

कमल अक्सर अपने मित्रों को पर्सनल लोन के लिए एप्पलीकेशन ले के घूमते देखता था, जिनका जमघट ऑफिस के मुख्य द्वार पर सिक्योरिटी केबिन के पास में होता है। कमल अपने मित्रों को पर्सनल लोन लेने से रोका करता था। लेकिन आज उसे खुद इसकी बहुत जरूरत थी। उसने भी दो लाख की लोन राशि के लिए अप्लाई किया…. दो तीन दिनों में हीं बैंक के जांच-पड़ताल , वेरिफिकेशन के बाद राशि उसके एकाउंट में आ गयी। emi भी अगले माह से शुरू होनी थी।

आज कमल थोड़ा आशवान्वित और विश्रान्ति महसूस कर रहा था। माँ से और पिताजी से बात हुई। तबियत में काफी सुधार है और धीरे- धीरे पिताजी की पूर्ववर्ती दिनचर्या वापस आ गयी थी। कमल ने कई दिनों बाद ऋचा से आज रात खूब बातें करने का मन बनाया।

लेकिन फोन करते हीं, ऋचा ने शीघ्रातिशीघ्र दोनों परिवारों से शादी की बात करने को कही। ऋचा बता रही है, उसके घर वाले बहुत जल्द उसका रिश्ता कहीं और तय करने वाले हैं। कमल उसको सांत्वना देने लगा कि थोड़ा और धीरज रखो, मैं बहुत जल्द अपनी शादी की बात दोनों घरों में करूँगा। लेकिन, ऋचा बहुत अच्छे मूड में नहीं है आज। उसने बहुत बेरुखी से बातें की… कमल उदास हो गया, वह प्रतिकार न कर सका। बहुत लंबी होने वाली बात आज साढ़े पाँच मिनट में निम्नांकित ख्याल के साथ समाप्त हो गई….

भीगी नहीं थी मेरी आँखें कभी वक़्त के मार से..

देख तेरी थोड़ी सी बेरुखी ने इन्हें जी भर के रुला दिया

कमल ने शाइमा की पुरानी जीन्स से हीं मन बहलाने का सोचा और बिस्तर पे आ गया। राहुल सो चुका है, fm की आवाज धीमी करके कमल ने भी कम्बल तान ली।   किशोर दा की आशावादी आवाज में “रुक जाना नहीं तू कहीं हार के, कांटो पे चलके मिलेंगे साये बहार के… ओ राही…. ओ राही…” कमल सो गया….

सुबह उठकर, कमल ने फोन पे दीदी से बात की…

कमल – दी! कुछ करो …. माँ-पापा से बात करो। ऋचा के घर वाले अब उसकी शादी जल्दी करना चाहते हैं और उसके लिए रिश्ते भी आ रहे हैं।

दीदी ने प्रत्युत्तर में बताया कि माँ को उन्होंने सारी बातें बता दी है। माँ को थोड़ा दुख लगा क्योंकि उन्होंने एक लड़की पसंद करके रखी थी तुम्हारे लिए। तुमको माँ ने कई बार उसकी फ़ोटो भी दिखाने की कोशिश की। लेकिन तुम्हारी रुचि नहीं थी। हालांकि माँ तुम्हारे और ऋचा के रिश्ते के लिए राजी है। पिताजी से बात अभी नहीं हुई है।

…. तुम जब होली की छुट्टी में घर आओगे तो पिताजी से बात करके आगे की योजना बनाई जाएगी। ….कि ऋचा के घर पे कैसे बात-चीत शुरू की जाय।

कमल ने ऑफिस से आने के बाद देर शाम ऋचा को फोन करके अद्यतन किया। उसने बताया जब मेरी माँ राजी है फिर तो मैं किसी को भी मना लूँगा। आज उसे ऋचा से कुछ मीठे वचलन की उम्मीद थी… उसने ऋचा से कहा…

तमाम उम्र पड़ी है शिकायतों के लिए

तुम आज दिल न दुखाओ के रात जाती है

कमल अपनी बहुत सारी परेशानी मंत्रणा करने राहुल के पास गया बसंत पंचमी के दिन…. राहुल ने बताया कमल को कि कल वह कम्पनी की नौकरी से त्यागपत्र देने वाला है। कमल ने पूछा क्यों?

राहुल – दोस्त मेरा लक्ष्य सिविल सर्विसेस- आईएएस बनना है। मैं पिछले 8 महीनों से तैयारी तो कर रहा हूँ, लेकिन ना तो ठीक से परीक्षा की तैयारी कर पा रहा हूँ और ना हीं ठीक से नौकरी कर पा रहा हूँ। इसलिए मैंने पूरी कर्तव्यनिष्ठा से, सब कुछ भूलकर एक बरस इलाहाबाद में किसी अनजान कोने में बैठकर तैयारी करने का निर्णय लिया है।

कमल- लेकिन, इलाहाबाद क्यों? दिल्ली क्यों नहीं?

राहुल- सही कह रहे हो तुम, लेकिन अभी भी इलाहाबाद में कुछ पुराने सिविल सर्विसेस प्रवेश परीक्षा के मास्टर लोग बैठे हुए हैं।

एक और बात मित्र!, मैंने कभी जिक्र नहीं किया… दिल्ली ने मेरा प्यार छीन लिया यार। अपन को रास नहीं आई दिल्ली- एन सी आर। कल मेरा प्यार किसी और का हो गया। मैं रोक नहीं पाया, उसकी शादी हो गयी कल इसी दिल्ली में।

कमल – क्या बात कर रहा है।  कब, क्या, कैसे, कौन ? तुम तो मस्त- मौला बंदे हो। मुझे विश्वास नहीं हो रहा तुम्हारी बातों पर। और कभी मुझे ऐसा लगा भी नहीं….

राहुल ने प्रत्युत्तर में कहा-

तुम ना लगा पाओगे अंदाजा मेरी तबाही का…

तुमने देखा ही कहाँ है…. मुझको शाम होने के बाद…

लेकिन मित्र! हम मुहब्बत के हारे हैं, जिंदगी को तो हम अपनी मर्जी की तराजू में तौलेंगे।….. मिलता हूँ, आई ए एस बनने के बाद। ……

ध्यान रख अपना और ऋचा का भी।

राहुल त्यागपत्र देकर अलविदा हो गया इलाहाबाद के लिए, अपनी असफल मुहब्बत को भूलकर…. एक नए सफर में….अपनी मंजिल की तरफ।

लेकिन …वह कमल को अकेला छोड़ गया। उसने कमल के मुहब्बत को तो मुकम्मल कर दिया था, लेकिन अंजाम बाकी था अभी।

होली में जाने से पहले तीन बिड्स सबमिट होने थे। पूरी बिडिंग टीम व्यस्तता की पराकाष्ठा कर रही थी, कमल भी अपने योगदान में पीछे नहीं है। लेकिन काम के अलावे वो दुखी रहता था और ऋचा से भी बहुत सारी बातें अब नहीं करता। क्योंकी वह जानता था ऋचा का रूखा व्यवहार गलत नहीं है। एक पावन स्त्री मन में भय भी बहुत होता है शादी-विवाह को लेकर। एक मर्यादा होती है, जिसको भारत की बेटियाँ लाँघती भी नहीं हैं, और कोशिश भी नहीं करती हैं। यद्यपि, कमल चाहता है कि ऋचा अपने घर में सूचना तो दे। किसी एक सदस्य को भी… माँ को या पिताजी को या फिर अपनी बड़ी दीदी को। यह कठिन वक्त है कमल को अपना मनोबल बनाये रखने के लिए। वह भी तब …. जब उसका परम मित्र एक बरस के लिए भूमिगत हो गया।

इन्हीं संवेदनाओं की वजह से कमल ने एक महत्वपूर्ण टेंडर की तैयारी में कुछ फ़ॉर्मेट्स निर्धारित समय में तैयार नहीं की। जबकि पांडे साब ने कमल को स्पेशल अटेंशन देने के लिए बोला था। और तो और कमल ने कॉस्टिंग कैल्कुलेसन में भी कुछ गलती की थी, शायद व्यक्तिगत तनावों की वजह से। हालांकि कमल ने दीपक सर से पुनर्निरीक्षण के लिए अनुग्रह किया था। लेकिन दीपक सर साफ इंकार कर गए पांडे साब के सामने।

कमल , दीपक सर की तरफ देख कर विचारमग्न था…

हमेशा ही नहीं रहेते कभी चेहरे नकाबों में ….

सभी किरदार खुलते हैं कहानी खत्म होने पर..

आज पहली बार कमल को पांडे साब ने बहुत डाँटा। वह दुःखी है। …. ऑफिस में लगभग सभी के जाने के बाद कमल अकेला अपनी सीट पर बैठा गणपति बप्पा की छोटी सी मूर्ति को निहार कर प्रार्थना कर रहा है इन विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष की ताकत और दिशा देने के लिए…. तभी HR से इस वर्ष के एनुअल अप्रैज़ल फॉर्म के लिए मेल नोटिफिकेशन आया, जिसे पंद्रह दिनों के अंदर सबमिट करना था। कमल बैठा बैठा फिर सशंकित हो गया। केवल आज की घटना को लेकर पांडे साब ने मेरा अप्रैज़ल पेपर भर दिया तो पूरे बरस की मेहनत और लगन का सही मूल्यांकन नहीं होगा।

उफ्फ… मेरा प्यार, मेरे माँ-पिताजी, मेरा कैरियर, मेरा लोन -कर्ज…..

कमल गणपति को फिर निहारने लगा….

अफवाहों का दौर है

कयास जारी हैं

प्रश्न अनुत्तरित है

तथ्य उलझे हैं,

यथार्थ गौण हैं

महानायक मौन है…

हाँ, कमल मौन है

विजेता कौन है??

(क्रमशः)

2 thoughts on “Diary of a GET- Part 5

  1. Good one. Getting inspired from form of poem in between the story-

    ‘ख्वाईशो ने मजबूर कर दिया है
    ठोकरों ने मज़बूत कर दिया है!
    पाने में ही ख़ुशी ढूंढता हूँ बस
    कभी खोने में मज़े क्यों नहीं लेता!
    बस मंज़िल पे ही आस लगा ली है
    कभी रस्ते से उल्फत क्यों नहीं करता !……….’

    मेरी उम्र और मेरे तजुर्बे में बस फासला इतना था के
    उम्र गिनती के हिसाब से बढ़ती रही और तजुर्बा लम्हो के !!!

    🙂 🙂

  2. तुम ना लगा पाओगे अंदाजा मेरी तबाही का…
    तुमने देखा ही कहाँ है…. मुझको शाम होने के बाद…

    agar kuch kamal hota hai duniya me to inhi lines se hota hai…

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