Diary of a GET- Part 6

By Kirti Vardhan (NSBU, HCIC, WDFCC –  CTP 3R Project, Mehsana, Gujarat)

[Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। कहानी में उपयोग हुए सभी पात्र, स्थान, L&T प्रबंधन के सभी पात्र – उनके हिरार्की और परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में किसी घटना से संबंध होता है तो इसे महज संयोग हीं माना जायेगा। इस कहानी श्रृंखला का उद्देश्य केवल मनोरंजन है, जिससे लेखक सामान्य तौर पे एक GET के शुरुआती दिनों की याद ताजा कराने की कोशिश मात्र कर रहा है।]


For Part 5 of the Diary Please visit :

http://www.enlightenment.ind.in/writers-corner/2017/12/diary-of-a-get-part-5/


गणपति बप्पा को निहारते निहारते, एक रोबोट की तरह कमल डेस्कटॉप सिस्टम इत्यादि शट डाउन करके ऑफिस से रूम की तरफ कदम बढ़ाने लगा और विचरण करता हुआ ऑफिस कैम्पस के मुख्य द्वार तक आ पहुंचा…

एक दुनिया है कि हंगामा ही हंगामा है,

और इक मैं हूँ कि तन्हाई ही तन्हाई है

यही मुख्य निकास द्वार पर एक जान पहचान के सिक्योरिटी गार्ड ने कमल को रोकने के लिहाज से  टोका…

“साब! आज बड़े उदासी चेहरा लिए हुए जा रहे हैं घर? सब ठीक तो है ना? सर हमलोग छोटे आदमी हैं, दिन भर दुइ-चार रुपिये के लिए मेहनत करते हैं। . ..(कमल अब ध्यान लगा के सुनने लगा)…..आप सभी का हँसमुख चेहरा देखकर और कई बार आपलोगों की वार्तालाप सुनकर हमें प्रेरणा मिलती है…  कुछ दिनों से आपको बहुत उदासी में देख रहा हूँ?.. ..)

कमल ने गार्ड को प्रत्युत्तर दिया … “नहीं रमेश जी उदासी की कोई बात नहीं हैं। बस ऐसे हीं काम के बारे में सोच रहा था। धन्यवाद आपका… अच्छा चलता हूँ, शुभ रात्रि”

लेकिन इस छोटी सी वार्तालाप ने कमल को बहुत साहस दी…. उसने अपने आप से कहा…

“कैसे कह दूँ कि थक गया हूँ मैं

जाने कितनों का हौसला हूँ मैं।

कमल टहलते हुए रूम की तरफ चलने लगा, फ़ोन बजा… नानाजी का कॉल?

कमल – हैल्लो नानाजी प्रणाम

नानाजी – खुश रह बेटे! कैसा है मेरा बच्चा?

कमल – ठीक हूँ, आप कैसे हैं? स्वास्थ्य कैसा है आपका?

नानाजी – मैं तो ठीक हूँ मेरे बच्चे। लेकिन तुम लोगों की चिंता लगी रहती है। तुम्हारी माँ भी कुछ बताती नहीं, लेकिन तुम तो बता सकते हो न अपनी परेशानियों के बारे में? पिता बीमार हैं तो क्या हुआ, मैं तो हूँ ना अभी। तुम्हें मेरे रहते हुए पर्सनल लोन लेने की क्या आव्यशकता थी। मेरी नाराजगी है इस बात से। मैं विपदा में तो अपने बच्चों की सहायता और निर्देशन तो कर हीं सकता हूँ।… कमल हंहकारी भरकर सुन रहा है। नानाजी बोले, बेटे मैंने बहुत पाक साफ धन कमाया है। पर मैं एक शिक्षक हूँ, शिक्षा से मैं अभी भी बहुत लोगों की परेशानियां बदल सकता हूँ।

कमल – मुझे मालूम है नानाजी, लेकिन कुछ दिनों से मैं सही दिशा में निर्णय नहीं ले पा रहा हूँ। मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। मुझे आपसे बात करनी चाहिए थी।

नानाजी – बेटे! मैं समझ सकता हूँ। लेकिन घर मैं गया था तुम्हारे। घर के खर्च और पिताजी के डॉक्टर- दवाई खर्च के पैसे तुम्हारी माँ को देकर आया हूँ। तुम अपने कार्य क्षेत्र पर ध्यान दो। मैं और तुम्हारे दोनों मामा घर आते- जाते रहेंगे।

कमल – जी नानाजी। मैं वाकई परेशान था, यह एक बड़ी बात बताई आपने।

नानाजी – तुम चिन्ता ना करो बेटे, समाज ऐसे हीं परस्पर मिलकर चलता है। …. एक और बात कमल! मैं नहीं जानता तुम्हारे कार्य क्षेत्र का कितना तनाव है तुमपर। लेकिन तुम उम्र की जिस दहलीज पर हो, अवश्यम्भावी, तुम तनाव में हो सकते हो। इसके लिए मैं तुम्हें एक शिक्षा की बात बताता हूँ…. कम्युनिकेशन मने वार्तालाप, सही व्यक्ति से, सही समय पर, सही मोड मने जरिया और सही भाषा में बहुत जरूरी है। कई बार हम परसेप्शन के मकड़जाल में उलझ जाते हैं। यहीं से व्यक्ति और परिस्थितियों के प्रति हम नकारात्मकता डेवेलप करने लगते हैं। इससे बचने की कॉरपोरेट में कोशिश करना। अपना ध्यान रखो।

कमल रूम पहुँच गया। फ्रेश होकर देखा घड़ी साढ़े आठ बजा रही है। उसने नानाजी की बात का मनन किया और अपने बॉस पाण्डे साब को फोन मिलाया। कमल ने अपनी गलती मान ली और पाण्डे साब को उसकी वजह भी बताई। पिताजी के स्वास्थ्य और आर्थिक कमी की वजह से वो ध्यान नहीं लगा पाया। पाण्डे साब ने सकारात्मक उत्तर दिया और बोला “कोई बात नहीं, मैं समझ सकता हूँ। तुम अब अपने काम पर ध्यान दो”

कमल का मन अचानक इन दो- तीन घंटों में बहुत आशावान और सकारात्मक हो गया। उसने ऋचा को शुभ रात्रि टेक्स्ट किया और सोते- सोते सोचने लगा…

राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें

रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो…..

कमल सुबह ऋचा से ऑफिस साथ में चलने को मेसेज किया…. दोनों अपने अपने रूम से निकलकर कॉलोनी में नुक्कड़ पर मिलकर साथ ऑफिस को निकलते हैं। रास्ते में… सुप्रभात के बाद… कमल ने रंग बरसाया…

तेरे बाद किसी को प्यार से न देखा हमने,

हमें ईश्क का शौक है, आवारगी का नहीं!

ऋचा – क्या बात है, जनाब बड़े मूड में लग रहे हैं।

कमल ने बनावटी नाराजगी जताते हुए बोला..  मैंने तो सोचा था मेरे शब्दों को वाहवाही मिलेगी लेकिन…

मैंने पत्थर से जिनको बनाया सनम….

वो खुदा हो गए देखते देखते….

कमल ने ऋचा से पूछा ”तुम घर कब जा रही हो?

ऋचा – अरे हाँ, मैं बताना भूल गयी थी, आज शाम को हीं मैं घर आगरा जा रही हूँ। दीदी अपने ससुराल से आ रही हैं। कल रविवार है, सोम की छुट्टी लूँगी मैं। मंगल को सुबह ताज से सीधा ऑफीस आऊँगी। फरीदाबाद स्टेशन से सुबह पिक कर लेना मुझे।

कमल फिर बोला, मैंने निर्णय लिया है कि कल रविवार को मैं तुम्हारे घर आगरा जाऊँगा और आपके माँ-पिताजी से बात करूँगा।

ऋचा को कमल से ऐसी हिम्मत की उम्मीद नहीं थी। यद्यपि वह खुद हीं कमल को अक्सर उलाहना देती रहती है अपनी शादी की बातचीत आगे बढाने के लिए। वह काँप गयी थी। उसने बोला – एकदम से ऐसे कैसे?

कमल – मुझे अपनी दीदी का नम्बर दो, मैं पहले उनको बात करके बता दूँगा।

कमल ने ऋचा की दीदी से बात करने का निर्णय लिया ये सोचते हुए …

इसी उम्मीद पे किरदार हम निभाते रहे

कि रुख़ करेगी कभी दास्ताँ हमारी तरफ़

उसने दीदी से फोन पर बात की और बोला मैं आपके घर आकर आपके माँ-पिताजी से मिलना चाहता हूँ। आप हमारे विषय में जानती हैं, हमारी सहायता कीजिये।

दीदी ने प्रत्युत्तर में कुछ नहीं कहा। केवल हाँ, हूँ से उत्तर दिया।

आज शनिवार की शाम ऑफिस से डायरेक्ट हीं ऋचा आगरा के निकल गयीं। कमल सराय चौक तक छोड़ने आया था। दोनों ने दिन भर और ऑफिस से बस स्टैंड तक एक- दूसरे से कुछ भी न कहा। कमल ने बस छूटने के बाद ऋचा को मैसेज किया …

दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर….

जो इधर दिल में है या रब वो उधर पैदा कर…..

कमल ऑफिस वापस आ कर अपने डेस्क पर बैठा, शनिवार की शाम पौने सात बजे कोई आशिक या कोई वास्तविक वरकोहलिक हीं ऑफीस में मिलेगा। बैठे हुए कमल के काँधे पर एक प्यार की चपत किसी ने लगाई। वो कुर्सी से उठ खड़ा हुआ.. पाण्डे साब हैं… कमल! तुम अभी बैठे क्या कर रहे हो। जाओ वीकेंड मनाओ। सब ठीक?

कमल – हाँ सर। बस निकल हीं रहा हूँ।

पाण्डे सर – ओके। अअअअ, आज मैंने तुम्हारी कॉस्टिंग और स्ट्रेटेजिक पॉइंट्स वाली उमरा-2 टेंडर की मेल चेक की थी। अब तुम परिपक्व टेंडर मैनेजर बन गए हो। वेरी गुड पॉइंट्स। ये टेंडर तुम हीं लीड करो। दीपक से भी मैंने बात कर ली है। गुड। सी यू। हैप्पी वीकेंड। और हाँ, तुम्हारा अप्रैज़ल पेपर ड्राफ्ट मैंने फील किया है। मंडे तुमसे डिस्कस करके सबमिट करूँगा। सी यू…

कमल थोड़ा रिलैक्स हो गया। कल आने वाले तूफान से उसे कुछ रियायत मिल गयी है। वह एक शांतचित्त योद्धा की तरह ऑफीस से रूम की तरफ निकला। दो घंटे बाद फिर से ऋचा को मैसेज किया ….

मै इत उत जाऊँ

वो उत उत डोले

मै नींद में डूबूँ

वो सारी रैन निहारे

सूरत से लागे है सलोना

सीरत से चंचल मृगछौना

मै उसकी आँच से जल जल मरूँ

वो बिछ मेरी देह पे चंदन बने

मै चाहूँ उसको पूरा पूरा

वो तरसाये मुझे हो अधूरा…

रात भर कमल को नींद नहीं आयी। वह सोने की असफल कोशिश करते हुए, ऋचा की दीदी को मैसेज किया कि कल करीब 10बजे वह आगरा पहुँच जाएगा।

रविवार सुबह बदरपुर बोर्डर से कमल को आगरा जाने वाली दिल्ली से आ रही सीधी बस मिल गयी। बस से हीं यात्रा में कमल ने अपनी दीदी को बक्सर फोन किया और ऋचा के घर जाने की पूरी बात बताई। दीदी बहुत गुस्सा हुईं। बोलीं ” इतनी जल्दी क्या है, मैं पहले माँ से बात करके बताऊँगी। ऋचा के माँ-पापा मालूम नहीं कैसे रियेक्ट करेंगे। कमल कुछ नहीं सुना।…

वह आगरा में भगवान टॉकिज के सामने उतरकर कमला नगर के लिए ऑटो ढूँढने लगा… एक विक्रम रुकी… ड्राइवर ने आवाज लगाई …”पल्ली साइड से आ जा लल्ला”

कमल दूसरी साइड में ड्राइवर के बगल ऑटो में बैठ गया। …कमला नगर में कहाँ जाओगो? ड्राइवर ने पूछा…

कमल – जी वो फेमस मिठाई की दुकान है ना? …

ड्राइवर- जे कहाँ उतरोगो? ठीक से बता?

कमल- आप B ब्लॉक के सामने वाले रस्ते पर उतार देना।

कमल चल पड़ा ऋचा के घर की तरफ… उसने ऋचा को उनकी दीदी को भी करीब पौने दस बजे मिस कॉल किया। अभी वो ठीक घर के बाहर खड़ा था।

सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार के कस्बे के मकान। चहार दीवारी पुरानी है लेकिन चुना हुआ रखा है। लोहे के सीखचों से बना मेन गेट भी नया नया पेण्ट हुआ है। कंपाउंड में चारों तरफ फूल पत्ते लगे पड़े हैं। एक तरफ एक लेडीज सायकल पुरानी होकर पड़ी हुई है, जिसमें अब किसी चोर को भी रुचि नहीं होगी। लेकिन साथ मे एक नई मस्त हीरो रेंजर की स्पोर्ट्स साईकल भी पार्क है। दूसरी तरफ एक नई सी एक्टिवा स्कूटर भी शान से खड़ी है। वह मेन गेट खोलके अंदर दाखिल हीं हुआ कि एक किशोर मस्ती में झूमता हुआ घर के बाहर निकला और उसने सीधा अपने हीरो रेंजर पर अटैक किया। साईकल उठाते हीं एक अजनबी को देख उसने कमल से पूछा “किससे मिलना है?”

कमल – मैं ऋचा के ऑफिस में काम करता हूँ।

इतना सुनते हीं उस किशोर ने जोर की आवाज लगाई ” ऋचा दीदी !!! आपके ऑफिस से कोई मिलने आये हैं….

ऋचा की शादी-शुदा दीदी बाहर निकलीं, और पीछे से संभवतः उनके पिताजी।

दीदी ने कमल को पुकारा … अंदर आइये… बैठक कक्ष के बाहर खड़े खड़े हीं, दीदी जी कमल का परिचय पिताजी से कराया.. ” ये ऋचा के ऑफिस के दोस्त हैं, आज आगरा किसी काम से आये थे, तो मिलने चले आये। जब ऋचा ड़ेंगू से बीमार थी तो इन्होंने काफी मदद की।

कमल ने मन में हीं सोचा, बाकी सब तो ठीक है… ये इंट्रोडक्शन में “किसी काम से” … ये कहानी हुई?

खैर… सभी अंदर गए। बैठे… ऋचा और उनकी माँ भी बैठक में आईं। कमल ने ऋचा को हैल्लो बोला। माता जी को चरण स्पर्श किया।

चाय नाश्ते के बाद ….सब मूक हो गये … पिताजी वहीं बैठे अखबार में व्यस्त हो गए…. माँ बीच बीच में आ जा रहीं थीं। लेकिन पिन ड्राप साइलेंस…. कमल दोनों बहनों को घूरने लगा। कुछ देर तक दोनों ने कमल से नजरें मिलायीं लेकिन फिर झुका ली…. एकदम शान्त…. केवल अखबार के पलटने की आवाज बीच बीच में आती थी।

कमल ने पूरी हिम्मत जुटा के बोला …. “अंकल!!!! कुछ ..अअअअ… बात करनी है आपसे…

तब तक माँ भी आ गई थी।

कमल – मैं…. और अअअअ… ऋचा… शादी …….

इसके बाद पिताजी अखबार को एक तरफ रखकर कमल को बिना पलकें झुकाये घूर रहे थे… कुछ तीस सेकंड बाद उन्होंने बोला….

पिताजी – बेटे!! हिम्मती तो बहुत हो तुम। वो कमल की तरफ घूरते हुए हीं ऋचा से पूछे – ये लड़का जो कह रहा है, उसमें तुम्हारी मर्जी है?….

…..किसी से कोई जवाब नहीं… ऋचा मैं तुमसे कुछ पूछ रहा हूँ? क्या इसमें तुम्हारी मंजूरी है?.. ऋचा नजरें झुकाये अब सिसकियां ले रही है।

फिर पिताजी ने बड़ी बेटी से पूछा… ऋतु!!! क्या तुम्हें इस विषय में कुछ पता है? दीदी जी के मुख से दो तीन बार केवल पापा शब्द हीं निकल पाया। पिताजी ने फिर चिल्लाकर पूछा ” ऋचा??????…

ऋचा जोर से रोते रोते बोली “नहीं” ….वह सर उठा नहीं पाई। कमल सन्न हो गया…

माँ बोली कमल से – बेटा!! ऐसे किसी घर की इज्जत बेजा नहीं करनी चाहिए? हमारी बेटियां संस्कार में पली- बढ़ी है…. हम जहाँ कहेंगे, वहीं रिश्ता- विवाह होगा। हमारा बड़प्पन है कि आप अभी भी हमारे घर में इज्जत के साथ बैठे हो।

पिताजी – देखो बेटा!! तुम्हारी उम्र जोश वाली है, तुमसे समझने में भूल हुई होगी। हमारी बेटियां ऐसी नहीं हैं….. अब पिताजी थोड़ा क्रोधित होने लगे थे… तुम्हारी जात तो नहीं पूछूँगा, लेकिन हमारे घर में आने की हरकत देखके लगता नहीं कि हमारी बराबरी के होगे?…..वैसे कहाँ के रहने वाले हो?…  तुम्हारे घर वालों को बताकर आये हो? उनको पता है तुम्हारे हरकतों के बारे में?

माँ – आप इतना क्या बात कर रहे हैं जी…. फिर कमल से बोलीं ….तुरन्त निकलो मेरे घर से और खबरदार मेरी बेटी को ऑफिस में परेशान किया तो?

कमल उठा, एक बार ऋचा पुकारा… पिताजी लगभग हाथ उठाने के लिए लपके… कमल बाहर की तरफ निकला…. दीदी जी कमल से नजर नहीं मिला पायीं…

कमल बड़ा रुसवा होकर घर से निकला। उसे क्रोध नहीं है, किसी पे भी नहीं। केवल उदास है वो, बहुत उदास। बिना क्रोध की उदासी बहुत भयावह होती है… पथभृष्ट होती है। अंधकारमय होती है… कमल उस घर से एक बागी- वैरागी की तरह आगरा में बस स्टैंड की तरफ बढ़ चला… एक हीं ख्याल …

कुछ मिला भी नहीं कुछ कमी भी नहीं, आंख में वो पहली सी नमी भी नहीं

कुछ पता ही नहीं क्या हुए, आज हम देवता भी नहीं, आदमी भी नहीं…

….. कमल ने बस में बैठते हीं राहुल को फोन किया…. कई कॉल्स के बाद राहुल का मेसेज आया…. ” IAS prelims in 10days. Can’t take calls. See you after pre exam.”

दीदी भी बक्सर से बार बार फोन कर रही थीं। कमल ने फोन नहीं उठाया, उनको मैसेज कर दिया “I am alright. कुछ नया नहीं है। सब ठीक है। बस से फरीदाबाद वापस आ रहा हूँ।”….

कमल सोमवार को समय से पहले ऑफीस पहुँच गया। उसे सब कुछ शान्त चित्त लग रहा था।…. पाण्डे साहब ने कमल को अपने केबिन में बुलाया। अप्रैज़ल के एक एक बिंदु के बारे बात करते जाते और कमल के सामने हीं नम्बर भरते जाते। कुल मिलाकर कमल को बहुत अच्छे नम्बर मिले।  इस घड़ी में यह बहुत बड़ी टॉनिक थी। हालाँकि वह मर्ज अलग है, यह टॉनिक अलग है।

कमल एक बड़े टेंडर की तैयारी में लग गया पूर्ण मनोयोग से। ऋचा दो- तीन दिन बाद ऑफीस वापस आईं। लेकिन दोनों में कोई बात नहीं होती। ऐसा लगता है, दोनों को एक दूसरे में रुचि भी नहीं….

लेकिन कमल… उसका व्यस्तता की पराकाष्ठा तो कुछ और कहती है….

कुछ ही देर की खामोशी है….

फिर कानों में शोर आएगा…

तुम्हारा तो सिर्फ वक्त है….

हमारा दौर आएगा..

(क्रमशः)

 

 

3 thoughts on “Diary of a GET- Part 6

  1. लिखते ही चल ऐ काफ़िर,अपने इश्क की दांस्तां
    अभी बहुत दर्द हैं , तेरे इश्क़ के दरमियान

Comments are closed.