Diary of a GET- Part 7


By Kirti Vardhan (NSBU, HCIC, WDFCC –  CTP 3R Project, Mehsana, Gujarat)

[Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। कहानी में उपयोग हुए सभी पात्र, स्थान, L&T प्रबंधन के सभी पात्र – उनके हिरार्की और परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में किसी घटना से संबंध होता है तो इसे महज संयोग हीं माना जायेगा। इस कहानी श्रृंखला का उद्देश्य केवल मनोरंजन है, जिससे लेखक सामान्य तौर पे एक GET के शुरुआती दिनों की याद ताजा कराने की कोशिश मात्र कर रहा है।]


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http://www.enlightenment.ind.in/writers-corner/2018/01/diary-of-a-get-part-6/


[ पाठकों से दो शब्द :–

मित्रों ! उम्मीद है कि डायरी के सभी छह संस्करण आपको पसंद आए होंगे। इस माह सातवाँ संस्करण प्रस्तुत है। आने वाले मार्च महीने में आठवाँ संस्करण इस डायरी का अंतिम अध्याय होगा। एनलाइटनमेंट परिवार का सदस्य होना गौरव की बात है और इसके लिए मैं संपादकीय टीम का धन्यवाद देता हूँ। मार्च के बाद फिर कुछ कहानी-किस्सों के साथ उपस्थित होऊँगा।

तब तक पढ़ते रहें, लिखते रहें, मस्त रहें, आबाद रहें। जय एल एन्ड टी, जय भारत ।। ]


न जाने हार है या जीत क्या है

ग़मों पर मुस्कुराना आ गया है

कमल कर्म योगी की तरह पूर्ण मनोयोग से ऑफिस में अनवरत काम में लग गया। उसको आगरा की घटना ने बहुत शांतचित्त, स्वाभिमान और ऊर्जा से परिपूर्ण कर दिया। घर पे भी पिताजी के स्वास्थ्य की चिंता अब कमल को कम हीं रहती है , क्योंकि नानाजी और मामा लोग ध्यान रखते हैं।

लेकिन कमल का मन अनिच्छा की स्थिति में चला गया है। वह केवल काम किये जा रहा है…. कोई खुशी नहीं, कोई गम नहीं, कोई व्यक्तिगत चाह नहीं… किसी कर्मण्य साधु की तरह, केवल ऑफिस-काम, ऑफिस-काम…

अब तो कमल और ऋचा एक- दूसरे का सामना भी करते हैं तो अजनबी की तरह। और एक दिन तो हद हो गयी… ऑफिस से निकलते दोनों एकसाथ लिफ्ट में आये… कोई और नहीं लिफ्ट में… फिर भी दोनों में कुछ भी मुस्तकबिल नहीं हुआ… दोनों ने एक-दूजे को देखा तक नहीं। सन्नाटा, घोर सन्नाटा… हालांकि, लिफ्ट से निकलते बखत, ऋचा की आँखों से आँसू टपक पड़े हैं, उसने कमल की तरफ देखा भी एक-बारगी। लेकिन ….

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम

तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ

कुछ – एक बीस दिवस के बाद राहुल का फोन आया कमल के पास…  स्क्रीन पर “राहुल ” दिखते हीं, बहुत सारी सुखद स्मृतियाँ कमल के चित्त से गुजरीं, वो खिल उठा… वही पुरानी प्रफुल्लित मुस्कुराहट चेहरे को रंगीन कर गयी। … उसने फोन उठाया, कुशल- क्षेम के बाद पूरी आपबीती कह सुनाई।

फिर राहुल ने पूछा, अब ऋचा कैसी है? तुम लोग बात-चीत करते हो? आगे की क्या योजनाएं हैं?

कमल ने यथा स्थिति बताई तो राहुल का ये प्रत्ययुत्तर आया…

माना सफर मुश्किल है! तेरी राहें भी आसान नहीं…..!!

तू घर से न निकले, ये तो कामयाबी की पहचान नहीं…।।

कमल ने जवाब दिया, मित्र!

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है

जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा

कमल आगे बता रहा है, … लेकिन राहुल! यार समझ मे नहीं आ रहा, इस कहानी को क्या अंजाम दूँ। सब कुछ करके देख लिया। ऋचा के माँ-पिताजी से भी हिम्मत करके बात कर ली। लेकिन कुछ आशा नहीं, दूर तक कोई किरण नहीं । फिर जब मैं बात कर रहा हूँ, ऋचा और उनकी बहन को कुछ तो धनात्मक वक्तव्य देना है अपने घर में, अपने माँ-पिताजी से।

राहुल – मित्र! मध्यम वर्ग में लड़की पैदा होकर जिंदगी इतनी आसान भी नहीं होती। बहुत सारी सांस्कृतिक बंदिशें होती हैं। नहीं बोल पाई दोनों, उनको हिम्मत नहीं आ पाई होगी। हो सकता है, तुम नहीं होते सामने तो दोनों बोल देतीं। ऋचा तुमको जानती है, लेकिन उसके परिवार के लिए तुम अजनबी हो। भारत में अभी भी स्त्री होकर अपनी बात हर एक प्लेटफार्म पर रखना इतना आसान नहीं।

खैर और बताओ, अप्रैज़ल कैसा हुआ

राहुल पूछता रहा ….उसके लिए भी तुम बहुत परेशान थे?

कमल – उम्मीद है कि अच्छा हुआ है। देखते हैं एक-आध हफ्ते में परिणाम आ जाएँगे। तुम बताओ प्रीलिम्स के परिणाम कब आ रहे हैं, कैसा पेपर हुआ है?…

…. शुभकामनाओं और शुभेच्छा के साथ वार्तालाप समाप्त होती है।….

कुछ 10 दिवस बाद एक खुशनुमा सुबह को अप्रैज़ल की चिट्ठियां आने का समाचार प्राप्त हुआ। राहुल ने देखा कि सभी अन्य डिपार्टमेंट में चिट्ठियों का वितरण प्रारम्भ हो गया है। ऋचा के भी अच्छे परिणाम आये हैं, ऐसी सूचना मिली। कमल के डिपार्टमेंट में भी दुपहर के भोजन के बाद पेपर बाँट दिए गए। लेकिन पांडे जी ने कमल को देर शाम चिट्ठी देने के लिये बुलाया।

पाण्डे साब के केबिन में जाते बखत कमल को थोड़ा भय है, लेकिन उसकी अंतरात्मा को सुकून है कि अच्छा हीं होगा।…

पाण्डे साब ने कमल को बैठने के लिए बोलते हुए पेपर दिया…

पाण्डे साब – कमल! पूरे डिपार्टमेंट में तुमको सर्वश्रेष्ठ नंबर दिए हैं। मैं तुम्हारे फ़ास्ट लर्निंग और समर्पण से बहुत प्रभावित हूँ। इसके साथ हीं मैं तुमको कम्पनी स्पोंसर्ड एम बी ए के लिए भी नामांकित करता हूँ। तुम्हें बहुत शुभकामनाएं। लेकिन ध्यान रहे काम काटने की ललक और सीखने में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। वेल डन। बेस्ट ऑफ लक….

कमल अपने डेस्क पे जाते बखत खयाल करने लगा…

अपने हौसलों को खबर करते रहिए, जिन्दगी मंजिल नहीं सफर करते रहिए….

लगभग खाली हो चुके ऑफिस में चिट्ठी निहारते कमल की मोबाइल स्क्रीन पे राहुल कॉलिंग चमकने लगा…

फोन उठाते हीं… रोबदार , जोशीले और उमँग भरे आवाज में राहुल ने बताया कि उसका प्रीलिम्स का परिणाम आ गया है और उसने सिविल सर्विसेज मेंस के लिए क्वालीफाई कर लिया है। यह कमल के लिए दोगुनी खुशी का मौका है।

कमल ने भी अपने अच्छे अप्रैज़ल परिणाम के बारे में राहुल को सूचित किया।

वार्ता खत्म होने से पहले राहुल ने कमल से घर आने के किसी योजना के बारे में पूछा। कमल ने बताया अभी तो कोई कार्यक्रम नहीं है, लेकिन पिताजी से मिले काफी समय हो गया ।

राहुल – तो फिर एक काम कर, यहाँ इलाहाबाद आजा। एक दिन रुक के सेलिब्रेट करते हैं। फिर मैं भी तेरे साथ घर चलूँगा। मेरी भी अंकल-ऑन्टी से मुलाकात हो जाएगी।

दोनों दोस्त आने वाले सप्ताहांत में मिलने का निर्णय करते हैं। कमल ने दुइ दिन को छुट्टी ले ली और शनिवार रात इलाहाबाद को निकल गया।

सूरज पूरा निकलने को तड़प रहा था तभी ट्रेन इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पे दस्तक दे गई।

कमल स्टेशन से बाहर आया तो राहुल के साथ हीं उसको गोधूलि रोशनी में दो और जाने – पहचाने लोग दिखे …..

(क्रमशः, अन्तिम अध्याय की प्रतीक्षा करें)