Diary of a GET- Part 8 (Last Part)

By Kirti Vardhan (NSBU, HCIC, WDFCC –  CTP 3R Project, Mehsana, Gujarat)

[Disclaimer: इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। कहानी में उपयोग हुए सभी पात्र, स्थान, L&T प्रबंधन के सभी पात्र – उनके हिरार्की और परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में किसी घटना से संबंध होता है तो इसे महज संयोग हीं माना जायेगा। इस कहानी श्रृंखला का उद्देश्य केवल मनोरंजन है, जिससे लेखक सामान्य तौर पे एक GET के शुरुआती दिनों की याद ताजा कराने की कोशिश मात्र कर रहा है।]


For Part 7 of the Diary Please visit :

Diary of a GET- Part 7


कमल ने अब उन जाने – जाने  से जीवंत मानव आकृतियों को पहचान लिया था। नानाजी ??? अभी इतने तड़के इलाहाबाद में ?

मैंने तो नहीं बताया था कि मैं प्रयाग आ रहा हूँ…. और ये क्या ? नानाजी के साथ में ये कौन है ?? ऋचा के पिताजी ??

कमल आसन्न राहुल की ओर प्रतिमूर्ति की भाँति प्रश्नवाचक दृष्टि से घूरने लगा….

राहुल के दो शब्द प्रतिक्रिया के कमल के प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ गए…

आरजू तेरी बरकरार रहे,

दिल का क्या है, रहा रहा, ना रहा

राहुल ने इलाहाबाद स्टेशन से बाहर के अंतिम पग लेते हुए कमल की पीठ पर जोर की प्यारी थापी मारी…. अब कमल अपने नानाजी के निकट आकर चरण स्पर्श की चेष्टा की, उससे पहले हीं ऋचा के पिता जी ने कमल को कंधे से उठाकर अपने गले  लगा लिया… उनके मुख से अंतर्मन की वाणी निकली… बेटे!……

मेहनत से उठा हूँ, मेहनत का दर्द जानता हूँ,

आसमाँ से ज्यादा जमींन की कद्र जानता हूँ।

 

इलाहाबाद स्टेशन के सामने साढ़े चार बजे भोर की छोटे छोटे मंदिरों में राम-कीर्तन की धुन में यह बड़ी हीं अपरिभाषित परिस्थिति है….

नानाजी बोल उठे… चलो संगम… आज गंगा मईया के आलिंगन में मन तृप्त करते हैं…

इलाहाबाद के छोटू रिक्शा में चारों  संगम को कूच करते हैं। रास्ते में … कमल अश्रुपूर्ण नयनों से राहुल को निहारने लगा और मैथिलीशरण गुप्त की सुन्दर रचना को मनन करने लगा…

तृप्त हृदय को , सरस स्नेह से ,

जो सहला दे , *मित्र वही है।*

रूखे मन को , सराबोर कर,

जो नहला दे , *मित्र वही है।*

प्रिय वियोग  ,संतप्त चित्त को ,

जो बहला दे , *मित्र वही है।*

अश्रु बूँद की , एक झलक से ,

जो दहला दे , *मित्र वही है।*

संगम पहुँचकर, नानाजी ने एक प्लास्टिक की चटाई ले ली और सभी को संगम-स्नान करके सूर्य की लालिमा को अर्ध्य देने के लिए कहा।

नहाते बखत कमल ने राहुल से पूछा ” दोस्त ! ये सब कब? कैसे ?…

राहुल – इतने सवाल न पैदा कर मित्र, मेरा प्रीलिम्स खत्म हो गए और IAS मेंस के लिए समय बहुत कम है। तुम अपने मोहब्बत को मुकम्मल होते हुए देखो… हमारा क्या है? हम तो बस यही खयाल ले के घर बसाते रहते हैं….

कश्ती भी नहीं बदली दरिया भी नहीं बदला

और डूबने वालों का जज़्बा भी नहीं बदला…

तभी सूर्य की लालिमा अपनी छँटा बिखेरने के लिए तड़पने लगी और घण्टों की अमूल्य ध्वनि कर्णो को आंनदित करने लगे… गँगा आरती शुरू हो गए। संगम पर उपस्थित मंगल गण अगले 30 मिनटों के लिए आत्म- अनुभूति की सुन्दरतम आभा में तल्लीन हो गए।

आरती खत्म होने के बाद नानाजी ने बताया … यहीं पास में एक सोये हुए हनुमान  जी का मंदिर है। उसकी बड़ी ख्याति है। चलिए सभी लोग आशीर्वाद ले कर बक्सर की ट्रेन पकड़ी जाएगी।

सोये हुए हनुमानजी के दर्शन के बाद सभी गरम – गरम कचौड़ी- सब्जी और जलेबी पर आक्रमण करते हैं। तत्पश्चात स्टेशन जाकर ब्रम्हपुत्र मेल से बक्सर की तरफ रवानगी…. आसामी, बिहार और बंगाल के मजूरों से खचाखच भरी ब्रह्मपुत्र मेल के सामान्य बोगी में प्रवेश करना भी किसी युद्ध जीतने से कम नहीं। भारत की वित्तीय असमानता देखनी हो तो भारतीय रेल की किसी भी लंबी दूरी के ट्रेन की सामान्य बोगी से प्रथम श्रेणी AC बोगी और उनमें बैठे लोगों को, उनके व्यवहार, उनके खान पान और उनकी उम्मीदों को देख लीजिए।… इसी में पिसता हुआ मध्यम वर्ग जिसकी पसंद 3rd AC, जिसका सपना 1st AC और जिसको जनरल बोगी में चढ़ने से गुरेज नहीं…  इसी मध्यम वर्ग के चारों प्राणी बक्सर की तरफ अपने अपने सुहाने ख्वाब लेकर ट्रेन की गतिमान ध्वनि के साथ अपनी आवृत्ति को संरेखण करने लगे… इसी बीच ऋचा के पिताजी ने मूक स्थिति को तोड़ते हुए कमल से कहा

शब्द कहने वालों का कुछ नहीं जाता, लेकिन

शब्द सहने वाले कमाल करते है,

जीतने वाला ही नहीं बल्कि कहाँ पे हारना है,

ये जानने वाला भी महान होता है, बेटे कमल!

आप जब मेरे घर आगरे आये थे, मुझे पूरे मामले की जानकारी नहीं थी। आपको अपने पिताजी अथवा नानाजी को मुझसे बात करने के लिए भेजना था। खैर… मैं आपको अपना बेटा मानने के लिए तैयार हूँ। नानाजी से शादी सम्बन्धी सभी विषयों पर बातचीत हो गयी है।

कमल ध्यान से सुनता जा रहा है और विचार कर रहा…

जहाँ दूसरों को समझाना कठिन हो,

वहाँ खुद को समझ लेना ही बेहतर है ।

ट्रेन अब मुग़लसराय से निकलकर बक्सर पहुँचने हीं वाली है। राहुल और कमल दोनों ने अपनी सीट कुछ अन्य महिला यात्रियों को दे दी और बोगी गेट के पास खड़े होकर बातें करने लगे… राहुल की मेंस परिक्षा की योजनाओं के बारे में बात करने लगे… कमल ने राहुल से घट रही घटनाओं के बारे में धन्यवाद देना चाहा… राहुल का प्रत्ययुत्तर

*दोस्त उसे कहते हैं….*

*जिसके पास तराजू ना हो………*

ट्रेन बक्सर पहुँच गयी…. राहुल, कमल, नानाजी और ऋचा के पिताजी स्टेशन से घर पहुँचे। वहाँ बाहर चबूतरे पर कमल ने अपनी माँ और ऋचा की माता जी को चाय के कप के साथ बैठे देखा।

आज कमल के आश्चर्य, आशा और अनुभूति का दिन है। चाय – नाश्ता इत्यादि के बाद शादी के कार्यक्रम और प्रबंधन पर चर्चा होने लगी। कमल ने यह काम बड़े आगन्तुकों, नानाजी और मामाजी पर छोड़ दिया और राहुल के साथ बक्सर के स्कूली मित्रों से मिलने निकल गया।

कमल अगले दिन की शाम की ट्रेन से राहुल के साथ दिल्ली ऑफिस निकलने से पहले बातों – बातों में शादी की तारीख कोई दुई महीने बाद की सुनाई दी। कमल सभी को प्रणाम करके और माँ- पिताजी से गले लगकर स्टेशन निकल गया।

सुबह तड़के दिल्ली पहुँचकर फटाफट फरीदाबाद रूम पे फ्रेश होकर ऑफिस समय पर आ गया। HOD पाण्डे साब से शुभेच्छा के बाद दिन के कार्यक्रम की चर्चा हुई और कमल अपने डेस्क पर आकर काम मे तल्लीन हो गया।

कुछ छण बाद कमल को अपने कुर्सी के पीछे कोई आकृति महसूस हुई… पीछे मुड़ के देखा तो ऋचा है… समय रुक सा गया … यह पिछले एक बरस में पहली बार था जब ऋचा कमल के  डेस्क के पास आई है

दोनों कुछ न बोले, बस यही दोनों दिलों में गूँजी…

जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए

है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए

ऋचा ने खामोशी तोड़ी, आप कैसे हैं? भूल हीं गए…

यूँ पलके बिछा कर तेरा इंतज़ार करते है ,

ये वो गुनाह है जो हम बार बार करते हैं

जलाकर हसरत की राह पर चिराग,

हम सुबह और शाम तेरे मिलने का इंतज़ार करते हैं।

ऋचा अश्रुमय नयनों से सादगी में बोली ” यह रिश्ता मैंने ही मुकम्मल कराया”

कमल :-

मुझे इंतज़ार करना आता है…

बस तुम लौटना सीख लो…!!

ऋचा ने दोनों को साथ में कॉफी के लिए पैंट्री चलने का प्रस्ताव दिया… और अपने नयनों से कमल को कहने लगी…

मुझको आँखो से दिल में उतर जाने दो

कुछ बिगड़ जाने दो , कुछ सँवर जाने दो

सुलझाने दो उलझी ज़ुल्फ़ों से गुलाब की लड़ियाँ

उँगलियाँ फिरा कर बनाने दो अक्स हवा में

इन ज़ुल्फ़ों के साये में

इन बाहों के घेरों में

मेरी हर साँस गुज़र जाने दो

कुछ बिगड़ जाने दो

कुछ सँवर जाने दो….

कॉफी मशीन ने दो कप कॉफी ज़िईईई करके निकाली…दोनों जीवन साथी अपने कप लेकर पैंट्री से बाहर निकले हीं थे कि एक अपरिचित नौजवान ने दोनों को सुप्रभात की शुभेच्छा दी। कमल ने पूछा “कौन हैं आप”

नौजवान – सर मैं GET हूँ, आज हीं जॉइन किया। पांडे सर ने आपको रिपोर्ट करने के लिए बोला है….

(डायरी ऑफ अ GET – सर्किल स्टार्टस अगेन)