आखिरी कलाम


 

कुछ लफ्ज़ उनके नाम थे,

अब कह नहीं सकते |

 

बेफिक्री में दिल की बेचैनी,

यूँ समझा नहीं सकते |

 

लिखा है यह खत, एहि ख्वाहिश है,

खुद स्वीकार कर लेना |

 

तालीम कम थी, नादानी थी,

मेरे गुनाहो से मुझे आज आज़ाद कर देना |

 

-ALIK